प्रवचन - ८ अच्छे लोग और अहित - नये भारत की खोज - ओशो

 

नये भारत की खोज-(आठवां प्रवचन)

अच्छे लोग और अहित

नये भारत की खोज - ओशो
नये भारत की खोज - ओशो


प्रश्नकर्ताः आप जो विस्फोटक बातें देश के जीवन और गांधी जी के संबंध में कह रहे हैं, उससे तो लोग आपसे दूर चले जाएंगे।

उत्तरः मैं इसके लिए जरा भी ध्यान नहीं रखता हूं कि लोग मेरे करीब आएंगे या मुझसे दूर जाएंगे। वह मेरा प्रयोजन भी नहीं है। जो ठीक है और सच है, उतना ही मैं कहना चाहता हूं। सत्य का क्या परिणाम होगा, इसकी मुझे जरा भी चिंता नहीं है। अगर वह सत्य है तो लोगों को उसके साथ आना पडेगा, चाहे वह आज दूर जाते हुए मालूम पडे। और लोग पास आएं इसलिए मैं असत्य नहीं बोल सकता हूं। फिर, सत्य जब भी बोला जाएगा, तभी प्राथमिक परिणाम उसका यही होगा कि लोग भागेंगे। क्योंकि हजारों वर्ष से जिस धारणा में वे पले हैं, उस पर चोट पडेगी। सत्य का हमेशा ही यही परिणाम हुआ है। सत्य हमेशा डेवेस्टेटिंग है, एक अर्थों में..कि वह जो हमारी धारणा है, उसको तो तोड डालो। और अगर धारणा तोडने से हम बचना चाहें, तो हम सत्य नहीं बोल सकते। जान कर मैं किसी को चोट नहीं पहुंचाना चाह रहा हूं, डेलिब्रेटलि मैं किसी को चोट पहुंचाना नहीं चाहता हूं। लेकिन सत्य जितनी चोट पहुंचाता है, उसमें मैं असमर्थ हूं, उतनी चोट पहुंचेगी; उसको बचा भी नहीं सकता। फिर मैं कोई राजनितिक नेता नहीं हूं कि इसकी फिकर करूं कि लोग मेरे पास आएं। कि मैं इसकी फिकर करूं कि पब्लिक ओपीनियन क्या है?

मैं इस चिंता में हूं कि लोक मानस सत्य के निकट पहुंचना चाहिए। मैं लोक मानस के अनुकूल बनूं, इसकी मुझे जरा भी चिंता नहीं है। सत्य के अनुकूल लोक मानस बनाया जाए, इसकी मुझे चिंता है। और निश्चित ही बहुत सी बातें मैं कह रहा हूं, जो को चोट करने वाली हैं, आघात करने वाली हैं और विध्वंसकारी है। अभी मैं सच में कहा जाए तो पूरी बातें नहीं कह रहा हूं, जो कि और भी चोट करने वाली होंगी, और भी विध्वंसकारी होंगी। तो जैसे-जैसे लोगों की सुनने की भूमिका विकसित होती चली जाएगी, मैं उन सारी चीजों को कहना चाहूंगा।

तो यह प्रारंभ है यात्रा का। अभी इसमें और बहुत कुछ कहने जैसा है। जैसे जीवन के सारे मसलों पर हमारी दृष्टि थोथी और झूठी है, तो मैं जीवन के प्रत्येक मसले पर जहां-जहां झूठ है, वह कहना चाहूंगा। और न केवल कहना चाहूंगा, बल्कि अगर संभावना बन सकी और शक्ति इकट्ठी हो सकी तो उस चीज को बदलने के लिए भी चेष्ठा करूंगा। जैसे कि सेक्स के बाबत अभी मैंने कहा। इधर तीन वर्षों तक सिर्फ मैंने भूमिका बनाने की फिकर की। कभी-कभी थोडा मैं कुछ बोल रहा था..कभी ब्रह्मचर्य के संबंध में, कभी किसी और के संबंध में, लकिन पूरी बात नहीं कही थी। फिर मुझे लगा कि अब भूमिका बनी है, अब इस बात को कहा जा सकता है, तो मैंने कही। लेकिन अभी भी सेक्स पर बहुत कुछ कहने को है। और वह जैसे भूमिका बनेगी तो मैं कहूंगा।

ऐसी ही शिक्षा पर, ऐसे ही परिवार पर, ऐसे ही आर्थिक व्यवस्था पर, ऐसे ही देश की राजनीति पर।

मुझे लगता ऐसा है कि हिंदुस्तान में दि-तीन हजार वर्षों से जो लोग हुए विचारक, उनमें से कोई भी चोट करने के लिए हिंमत नहीं जुटा पाया। तो उसने ज्यादा से ज्यादा फिकर यह की कि वह पुराने ढांचे में ही पुराने शब्दों का ही उपयोग कर ले। पुरानी मान्यता को ही स्वीकार करके थोडी बहुत हेर-फेर कर सके तो करे। लेकिन सीधी चोट करने की हिंमत नहीं जुटाई जा सकी। इसलिए हिंदुस्तान में विज्ञान पैदा नहीं हुआ। क्योंकि साइंस तभी पैदा हो सकती है, जब हम अनन्य रूप से सत्य के प्रति समर्पित हों। हम इसकी फिकर छोड दें कि क्या परिणाम होगा। जो सत्य है, नग्न सत्य, उसको स्वीकृत करने की हिंमत से विज्ञान शुरू होता है, और नहीं तो फिर आदमी फिकशन में जीता है। हमारा मुल्क पुराण कथाओं में जी रहा है विज्ञान में नहीं। उसके चिंतन का ढंग साइंटिफिक नहीं है।

जो तकलीफ है, वह यह है कि हम सब व्यक्तियों से बंधे हुए हैं..कोई महावीर से बंधा हुआ है, कोई कृष्ण से बंधा हुआ है, कोई गांधी से बंध गया है। जो लोग भी व्यक्तियों से बंध जाते हैं, उनकी सत्य के प्रति यात्रा बंध हो जाती है। क्योंकि फिर वह सदा यह सोचते हैं कि इसने जो कहा है वही सत्य है। इससे अन्यथा सत्य नहीं हो सकता।

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तो अभी तो मैं सिद्धातों पर चोट कर रहा हूं, जो कि उतनी खतरनाक नहीं है। आने वाले दिनों में मैं व्यक्तियों पर भी चोट करूंगा, जो कि ज्यादा खतरनाक और डेवेस्टेटिक मालूम होगी। क्योंकि अगर मैं अहिंसा केसंबंध में कुछ करता हूं तो उतनी चोट नहीं पहुंचाती है। अगर मैं कहूं कि महावीर यह गलत कहते हैं, तो वह चोट और ज्यादा पहुंचने वाला है। क्योंकि व्यक्तियों से हमारे मोह ज्यादा हैं।

 

प्रश्नकर्ताः नेहरू ने कहा है कि…(अस्पष्ट)

 

उत्तरः इतनी आंखों के केंद्रित बन जाने से वह खुद हिप्नोटाइज हो रहा है। तो व्हिस्की का असर हो सकता है। नेहरू ने गलत नहीं कहा। इसलिए मैं व्यक्तियों पर चोट करने की तैयारी करूंगा, क्योंकि जब तक उन पर चोट नहीं की जा सकती, इस मुल्क में चिंतन पैदा नहीं किया जा सकता।

 

प्रश्नकर्ताः आप कम्पेयर कर रहे हैं?

 

उत्तरः न-न, कंपेयर नहीं कर रहा हूं, लेकिन जहां तक हिप्नोटाइज करने का सवाल है, वे कंपेयर किए जा सकते हैं। और किसी मामले में मैं कंपेयर नहीं करता हूं। यानी वह तो कोई भी नेता..नेतागिरी हिप्नोसिस पर खडी हुई है, लीडरशीप जो है, वह हिप्नोसिस पर खडी हुई है। लीडर होने का मतलब है कि जाने अनजाने हिप्नोटाइज करना, नहीं तो आप लीडर बन नहीं सकते। और जिस दिन दुनिया में हिप्नोटाइज के बाबत पूरी जानकारी हो जाएगी, उस दिन लीडर की मौत हो जाने वाली है, लीडर जिंदा नहीं रह सकता। तो अब वे सफल हिप्नोसिस के रास्ते खोज रहे हैं, जिनमें कि आपको ऊपर से भी पता न चले।

अभी मैंने पढा, एक एक्सपरिमेंट वे अमरीका में करते हैं..कि अभी फिल्म के ऊपर एडवरटाइजमेंट करते हैं आपके सामने। तो सामने का आदमी सचेत हो गया है एडवरटाइजमेंट से, क्योंकि एडवरटाइजमेंट कि जो हिप्नोसिस है, वह अमरीका में आज जाहिर हो गई है। एक लक्स टायलेट साबुन को बार-बार रिपीट करने से आदमी हिप्नोटाइज हो जाता है। तो अब जनता को पता चल गया है। तो अब एक रेसिस्टेंस पैदा हो रहा है। तो अब उसको इतने सूक्ष्म रूप से करना है कि उसको पता न चले। बडी अजीब बात निकाली है उन्होंने! वह यह है कि फिल्म चल रही है, चलती हुई फिल्म के बीच में, सेकंड के हजारवें हिस्से में लक्स टायलेट का बीच में से स्नेप निकल जाएगा। वह किसी को दिखाई पडेगा? फिल्म चल रही है, आप फिल्म देख रहे हैं, कहानी चल रही है, बीच में लक्स टायलेट सोप! आपको दिखाई नहीं पडेगा आंख से। तो इसको वे एक्सपरिमेंट कर रहे हैं। और इसका यह परिणाम हुआ कि वह दिखाई तो नहीं पड रहा है आंख से, लेकिन अनकांशस माइंड उससे इंप्रेस हो जाता है। और अगर वह एक फिल्म में तीस बार दिखा जाए, आपको पता भी नहीं चलेगा कि लक्स टायलेट साबुन कोई अच्छा साबुन है, लेकिन वह आपका माइंड पकड लेगा गहरे में और उसमें वह माइंड काम करेगा। तो जैसे ही हिप्नोसिस की पूरी जानकारी हमें हो जाएगी, तो लीडरशीप के नए रास्ते खोजने शुरू करने पडेंगे, लेकिन लीडरशीप हमेशा से हिप्नोटाइज करती रही है..चाहे वह जानकर हो, चाहे वह बे-जानकर हो।

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तीन तरह के लीडर हैं। जो लीडर जन्मजात हिप्नोटाइजर हैं, उनको कभी पता नहीं रहता कि हम हिप्नोटाइजर कर रहे हैं। उनको वही पता नहीं रहता! वह तो उनके जावन का हिस्सा है, वह चलता चला जाता है दूसरे वे हैं, जो व्यवस्था से लीडरशिप पैदा करते हैं। पूरे कांशस होते हैं वे, कि क्या करना, क्या बोलना, कैसा कपड़ा पहनना..हाउ टु इंप्रेस की पूरी व्यवस्था है। तीसरे वे हैं जिन्हें जबरदस्ती लीडर बना दिया जाता है। उनको न पता होता, न उनको कोई सहज भाव होता। वे बेचारे सिर्फ थोप लिए गए लीडर हैं। ये तीन तरह के लीडर्स हैं। इसमें हिटलर दूसरे तरह का लीडर है, जो पूरी की पूरी व्यवस्था से लीडशिप पर जा रहा है। स्टेलिन दूसरे तरह का लीडर है। नेहरू पहले तरह के लीडर हैं। कोई व्यवस्था नहीं हैं, लेकिन हिप्नोसिस तो है और वह जन्मजात है, वह व्यक्तित्व का हिस्सा है।

 

प्रश्नकर्ताः बड़े लोगों को तो हिप्नोटाइज नहीं किया जा सकता है।

 

उत्तरः उनको नहीं हिप्नोटाइज किया जा सकता है। सच तो यह है कि वह कोरिस्पॅान्डन्ट को हिप्नोटाइज कराने के लिए पहले दस लाख लोगों को हिप्नोटाइज करना जरूरी है। वह उनकी हिप्नोटाइज करने का ही हिस्सा है। आप मुझसे प्रभावित होंगे, जब दस लाख आदमी मुझसे प्रभावित दिखेंगे..तब कोरिस्पॅाण्डण्ट प्रभावित होता है। कोरिस्पॅाण्डण्ट तो प्रभावित होता है दस लाख के हिप्नोसिस को देखकर। तब वह सोचता है कि यह आदमी अर्थ का है, इसकी बात अर्थ की है। अगर मेरे पास एक आदमी भी नहीं हो, तो आप मुझसे पूछने नहीं आएं कि मैं क्या कर रहा हूं।

मेरा मतलब इण्डीवीजुअल नहीं है, मास हिप्नोटिजम की संभावना पूरी है। और इंडीवीजुअली हिप्नोटाइज करने में तो देर लगती है, मास हिप्नोसिस बहुत आसान है। एक एक आदमी को हिप्नोटाइज करने में एक एक आदमी रेजिस्ट करता है। मास हिप्नोटिजम में तो रेजिस्टेंस नहीं है किसी का। और आपके आसपास के लोग हिप्नोटाइज हो गए, तो आपको पता नहीं चलता कि आप कब हिप्नोटाइज हो गए हैं। तो एक इंडीवीजुअल को हिप्नोटाइज करना कठिन है हमेशा, क्राउड को हिप्नोटाइज करना हमेशा आसान है। क्योंकि क्राउड के पास रेजिस्टेंस नहीं रह जाता। इसलिए जितने लीडर हैं, वे सब क्राउड लीडर हैं। पर्सनल रिलेशनशिप में हिप्नोटाइज करना कठिन बात है, क्योंकि आप पूरे ही इंप्रेसड हैं। मैं यह जान कर हैरान हुआ कि अगर मैं आपसे बात कर रहा हूं और आपने प्रश्न पूछा है, तो उस प्रश्न के उत्तर में आपको प्रभावित करना ज्यादा कठिन है और शरद बाबू बैठे सुन रहे हैं, न उन्होंने प्रश्न पूछा, वह सिर्फ सुन रहे हैं; उनको प्रभावित करना ज्यादा आसान है, क्योंकि उनका कोई रेजिस्टेंस नहीं है। आप यह मत सोचना कि मैंने पूछा है तो यह गलत कह रहे हैं कि सही कह रहे हैं। आप रेजिस्ट कर रहे हैं। लेकिन पास बैठे हुए लोग हैं, उनका कोई सवाल नहीं है, उनका कोईरेजिस्टेंस नहीं है। इसलिए भीड हमेशा जल्दी ही हिप्नोटाइज होती है। और भीड को हिप्नोटाइज देखकर जो आदमी आता है, उसमें, इंडीवीजुल वह हिप्नोटाइज होता है। उसको तो कुछ समझ में ही नहीं आता..कि जहां दस लाख लोगों को देखा, वह एकदम से, जो दस लाख का एकदम से साइकिक एटमासफीअर है, वह उसमें डूब जाता है।

तो चाहे कोई जानता हो, चाहे कोई न जानता हो, आदमी को हिप्नोटाइज किया जा रहा है। और अगर हम मनुष्य को आध्यात्मिक रूप से सफल बनाना चाहते हैं, तो उसे सचेत करना जरूरी है कि वह हिप्नोटाइज न हो। उसको इतना सचेत करना जरूरी है। उसको इतना सचेत करना जरूरी है कि वह सम्मोहित होकर प्रभावित न हो। प्रभावित हो वह बिल्कुल दूसरी बात है, वह रेशनल बात है। आपको मैं समझाऊं, तर्क करूं, विचार करूं और ओपन छोड दूं कि आपकी मर्जी, तो मैं आपको हिप्नोटाइज नहीं कर रहा हूं। लेकिन हिप्नोसिस एक तरह की ट्रिक है। न मैं आपको समझाता हूं, न आरग्यु करता हूं, लेकिन आपको बेहोशी के रास्ते से आपको पकडने की कोशिश करता हूं।

अब यह एक बल्ब लगा हुआ रास्ते पर। पूरे वक्त जल रहा है और बुझ रहा है और आप को एडवरटाइज किया जा रहा है। पहले उनको पता था कि आप देखते थे कि एडवरटाइजमेंट स्थिर था, वह जलता-बुझता नहीं था। अभी वह हिप्नोटिस्ट ने बताया कि बुझाने से हिप्नोसिस आता है और रिपीट होता है। वैसे रिपीट नहीं होता है। लिखा है हमाम, तो आपने पढ लिया कई दफा, खत्म हो गई बात। लेकिन वह फिर जला, फिर बुझा। जितनी बार वह जला बुझा, उतनी बार आप को पढना पडा, हमाम। तो मजबूरी हो गई। वह तो हिप्नोटिस्ट बता रहे हैं, कि इसके जलाओ बुझाओ जल्दी जल्दी, ताकि वह आदमी निकलते-निकलते बीस दफे पढे कि हमाम, हमाम। बीस दफे पढने से रिपीट होगा तो उसके भीतर घुस जाएगा।

अब यह बदमाशी है। यह आदमी को नुकसान पहुंचाता है। इससे हम कुछ भी कर सकते हैं। इसका मतलब यह है.. और आज तो ब्रेन वाश, माइंड वाश इस पर चीन में इतना काम हो रहा है कि आप यह समझ लीजिए कि आदमी की स्वतंत्रता मुश्किल से पचास वर्ष बचने वाली है, अगर आदमी नहीं समझ गया तो। बिल्कुल पचास वर्ष से ज्यादा बचने वाली नहीं है आदमी की स्वतंत्रता। अभी हम बैठकर इतनी बार बात कर रहे हैं, यह संभावना रह जाने वाली है। क्योंकि आपके माइंड को कंट्रोल भीतर से किया जा सकता है। और आपको पता भी न चले कि जो आप बोल रहे हैं, वह आपसे बुलवाया जा रहा है। जो आप कह रहे हैं मुझसे, कहलवाया जा रहा है। और स्तर इतना अभी तो साधन टेप्स है और इन सबका काम जितना बढ गया है, वह इतना घबडाने वाला है कि इलेक्ट्रोड आपके माइंड में रखा जा सकता है। और ट्रांसमीटर मेरे हाथ में है, मैं दुनिया में कहीं भी रहूं और मैं वहां से कहूं कि आप इस वक्त सो जाइए, तो आपको सोना पडेगा उसी वक्त। वह माइंड में आपके जो इलेक्ट्रोड रख दिया है, वह बिल्कुल ट्रांसमीशन का काम कर रहा है रेडियो जैसा। वह कहेगा नींद आ रही है, नींद आ रही है, नीण्द आ रही है। तो इस बात की संभावना बन गई है अब, शायद आज की मनुष्यता को कंट्रोल किया जा सकता है। और बदमाश आदमी किछ भी कंट्रोल कर सकता है और कुछ भी करवा सकता है। और इतना काम उस तरफ हो रहा है कि अगर हम लोगों को सचेत नहीं करते तो आने वाले चालिस पचास वर्षों में मनुष्यता की सारी स्वतंत्रता खत्म हो जाने वाली है। कोई स्वतंत्रता नहीं रह जाएगी।

अभी पीछे कोरियन वार में जिन अमरीकन कैदियों को चीन ने पकड रखा था, उनका पूरा माइंड वाश करके भेजा उन्होंने। नौ महीने में वे माइंड वाश कर देते हैं! नौ महीने बाद जब वे अमरीका पहुंचे, तो वे कम्युनिज्म की प्रशंशा करते हुए पहुंचे और अमरीका को गाली देते हुए पहुंचे कि यह कैपिटलिज्म सब खराब है। और वह यह कहते हुए पहुंचे कि हमारे साथ बहुत अच्छा सलूक किया गया है। उनके साथ बहुत बुरा सलूक किया गया है, लेकिन उनके माइंड में रिपीटेडलि यह डाला गया है कि उनके साथ बहुत अच्छा सलूक किया जाता था।

रूस में जितनी भी ट्राइल्स हैं पिछले चालीस वर्षों में सारी ट्राइल्स में जिस आदमी को सजा दी, उसी से कन्फेस करवा लिया कि हमने यह पाप किया। एक आदमी ने रेजिस्ट नहीं किया, वह मामला है! और अच्छे-अच्छे लोगों से, जो कि बडी कोटि के विचारक थे, उनसे अदालत में यह कहलवा लिया कि हमने यह किया, हमने पाप किया, हमने स्टेलिन को मारने की कोशिश की। न तो गवाही के जरूरत रखी कुछ और सिर्फ माइंड वाश किया उन बेचारों का। उनको छःछः सात-सात महीने बंद रखकर उनके माइंड में रिपीटेडलि भाव डलवाया कि तुमने स्टेलिन की हत्या की कोशिश की। एक आदमी को सात दिन जगाया जाए, सोने न दिया जाए और सात दिन हर हालत में जगाए रखा जाए और सजेस्ट किया जाए कि तुमने स्टेलिन को मारने की कोशिश की। दो तीन दिन तक तो वह कहेगा, नहीं; मैंने कहां कोशिश की अहि? फिर नींद की कमी और उसको शक पैदा होगा कि कहीं मैंने की तो नहीं, लोग मुझसे कह रहे हैं। और सात दिन में वह आदमी कहने लगेगा, सातवें दिन कि मैंने कोशिश की है स्टेलिन को मारने की। अदालत में खड़ा करके उनसे कन्फेस करवा दिया कि मैंने स्टेलिन को मारने की कोशिश की।

मेरी तो चेष्टा यह है कि लीडरशिप अब खतरनाक रास्तों पर आदमी को ले जाएगी, तो उसे इस हिप्नोटिक स्थिति के प्रति सचेत करना जरूरी है। जैसा आप कहते हैं, मेरी बात उस वक्त कई भाव पैदा कर देती है आपके मन में, लेकिन अभी कोई रास्ता नहीं है, जब तक कि वह भाव पैदा न करूं। वह भाव पैदा होगा तो आप पूछेंगे, सवाल उठेंगे। और मैं तैयार हूं सवाल जवाब के लिए। मैं तो पूरे मुल्क को एक डायलॅाग में डाल देना चाहता हूं। तो जितने प्रश्न उठेंगे, उतनी बातें साफ हो सकेंगी। यह तो स्वाभाविक है कि मुझे सुन कर पच्चीस प्रश्न आपको उठते हों। मैं तो कहता हूं कि उठने चाहिए। सिर्फ जो जड बुद्धि हैं, उनको नहीं उठेंगे। लेकिन जो विचारशील होंगे, उनको उठना चाहिए।

 

प्रश्नकर्ताः आप मटिरिअल डेवलपमेंट पर जोर दे रहे हैं, जब कि गांधी स्पीचुअल।

 

उत्तरः मेरी दृष्टि में मेअॅटिअॅरिल डवलपमेंट जो हैं, वह फिलासफिक डवलपमेंट की पहली सीढ़ी है। कोई भी देश, कोई भी समाज, जब तक आर्थिक, भौतिक समृद्धि से भरा हुआ न हो तब तक उसका दार्शनिक विकास नहीं हो सकता है। और नहीं हो सकता है, क्योंकिदार्शनिक विकास के लिए एक बुनियादी जरूरत है कि भौतिक रूप से समृद्ध हो।

जब आदमी की रोटी की, कपड़े की, छप्पर की चिंता समाप्त हो जाती है, तब पहली दफा स्प्रिचुअल अर्ज पैदा होती है। तब वह पहली दफा पूछता है कि और क्या? जिसको रोटी नहीं मिल रही, कपड़ा नहीं मिल रहा, मकान नहीं मिल रहा, उससे आप कह रहे हैं, आत्मा परमात्मा का चिंतन करो, तो आप निहायत फिजुल बात कर रहे है। हिंदुस्तान में भी जिन दिनों धार्मिक चिंतन हुआ और फिलासफिक डवलपमेंट हुआ..बुद्ध या महावीर या कृष्ण, ये सारे के सारे लोग समृद्ध हिंदुस्तान की पैदाइश हैं। एक समृद्धि थी मुल्क में, लोग खुशहाल थे।। और उसमें भी बड़े मजे की बात यह है कि ये खुशहाल लोगों में से ही नहीं, ये सब राजपुत्रों के लडके हैं, ये सब शाही घरों केलडके हैं। बुद्ध, महावीर, कृष्ण, राम, सब राजाओं के लडके हैं। जहां लक्जरी पूरी होती है, जिंदगी में जहां सब समाप्त होता है, मनुष्य उन चीजों को पूछता है जो कि पहले पूछ ही नहीं सकता है। तो मेरी दृष्टि में आने वाली फिलासफिक जो भी संभावनाएं हैं, वे रूस और अमरीका में फलित हो सकती हैं, हिंदुस्तान में नहीं।

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तो मेरी दृष्टि में, जैसा अब तक समझा जाता रहा कि रिलिजियस, फिलासफिक या स्प्रिचुअल डवलपमेंट, मटिअरिअल डवलपमेंट विरोधी बाते हैं, ऐसा मैं नहीं मानता। मैं मानता हूं मटिअरिअल डवलपमेंट नेसेसरी स्टेप है, स्प्रिचुअल डवलपमेंट के लिए।

कैसे यह हिंदुस्तान में आएगा?

दो तीन बातें मुझे दिखाई पडती हैं। एक तो, कि हिंदुस्तान की पूरी चिंतना बदलनी पडेगी। इस संबंध में, समृद्धि का विरोधी है हिंदुस्तान और गरीबी का पक्षपाती है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण दृष्टि है। तो पहले तो हमारे मुल्ककी हमें यह दृष्टि बदलनी पडेगी कि समृद्धि कोई अशुभ बात नहीं है। बल्कि समृद्ध होंगे, तो ही हम धार्मिक हो सकेंगे। अभी क्या हमारे मन में बात है कि धार्मिक होने के लिए दरिद्र होना जरूरी है। यह बिल्कुल ही पागलपन की बात है। तोएक तो हमें इस मुल्क के विचार से यह बात निकाल देनी है कि गरीबी कोई पूजा की चीज है, या गरीब होना कोई बहुत अच्छी बात है। कि एक आदमी कोई लंगोटी लगाकर खड़ा हो जाता है तो कोई बहुत महान कार्य कर रहा है।

तो अभी एक फिलासफिक आफ पार्वटी, दरिद्रता का दर्शन हमारे चित्त में बैठा रहा है। कम से कम चीजें, कम से कम आवश्यकता..छोटे से छोटा मकान, दाल रोटी खा ली और अपना एक चादर ओढ़ लिया और गुजार दिया। जितनी कम जरूरत हो सके, उतनी कम रखो। कम जरूरत जिन लोगों के ख्याल में बहुत महत्वपूर्ण है वे देश को दरिद्र बना देंगे। मैं कहता हूं, जरूरत इतनी बढ़नी चाहिए। जरूरत इतनी बढाओ कि तुम्हें जरूरत बढाने से नये-नये मार्ग खोजने पड़ें, उनको पूरा करने के लिए, नई दिशाएं खोजनी पडें, तो समृद्धि की तरफ गति शुरू होती है। तो पहले तो एक समृद्धि का दर्शन चाहिए। यह दरिद्रता का दर्शन हटाने की जरूरत है मेंटली इसकी तैयारी करनी चाहिए।। पहले तो मेंटल तैयार करना पडे, तब मटिअरिअल तैयार होती है। वह दूसरी बात है। पहले तो मेंटली तैयारी बहुत जरूरी है।

अभी तो माइंड से हम गरीब हैं, और गरीब रहने को हम तत्पर हैं! बल्कि सच यह है, जो अमीर हैं, जिन से हम भीख मांग रहे हैं, उनको हम गाली दे रहे हैं, कि वे लोग अमीर हैं तो भौतिकवादी हैं। यह बड़े मजे की बात है कि अमरिका से हम भीख मांगकर जी रहे हैं और अमरीका को गाली दिए जा रहे हैं कि तुम भौतिकवादी हो, तुम मटिअरिलिस्ट हो; तुम फलां हो, ढिकां हो। हम आध्यात्मिक है! और तुम्हारा अध्यात्म यह है कि तुम्हें भौतिकवाद से भीख मांगनी पड रही है! तो पहले तो हमारे मन में यह साफ हो जाना चाहिए कि समृद्धि लक्ष्य है..एक-एक व्यक्ति के मन में और मस्तिष्क में। आने वाली पीढी और विधार्थियों के मन में समृद्धि का विचार गहराई से डालने की जरूरत है। ताकि हजारों साल की दरिद्रता का पागलपन खत्म हो जाए।

दूसरी बात कोई भी मुल्क तभी समृद्ध हो सकता है, जब टेकनोलॅाजी में विकसित हो। और हमारा मुल्क टेकनोलॅाजी में विकसित नहीं रहा, बल्कि हम टेकनोलॅाजी के दुश्मन रहे अब तक। और गांधी ने और मुसीबत खडी कर दी है पीछे। वह टेकनोलॅाजी के दुश्मन हैं, वह विनोबा भी टेकनोलॅाजी के दुश्मन हैं। तो इस मुल्क मेंटेकनोलॅाजी के खिलाफ एक हवा चल रही है। वह यह है कि अगर पैदल चलना है और चल सकें, तो कार की जरूरत क्य है? कार की जरूरत क्या है, हवाई जहाज की जरूरत क्या है? बडीमशीन की जरूरत क्या है? चर्खे से काम चलाओ, तकली कात लो! अब अगर तकली और चर्खा हम कातेंगे, तो हम कभी समृद्ध नहीं हो सकते, क्योंकि समृद्धि मूलतः नब्बे परसेंट टेकनोलॅाजी का फल है। जो संपत्ति पैदा होती है वह सौ में से नब्बे प्रतिशत टेक्नालॅाजी, टेक्नीक का फल है। तो हिंदुस्तान के माइंड को टेकनोलॅाजिकल बनाने की जरूरत है। यह बेवकूफी खादी की, चर्खे की, तकली की; आग लगा देने की जरूरत है। यह ग्रामोद्योग और बकवास बंध करने की जरूरत है। बडा उद्योग, केंद्रित उद्योग चाहिए। यह विकेंद्रीकरण की बात घातक है कि डेसेंट्रलाइज करो। क्योंकि जितना डिसेंट्रलाइजड हुई इकोनामी, उतनी ही गरीब होगी।

 

प्रश्नकर्ताः टेक्नालॅाजी को डवलप करने के लिए फायनेंस कहां से आएगा?

 

उत्तरः मेरे लिए तो बडा सवाल यह है, वह तो दूसरा सवाल है। बडा सवाल यह है कि हमारा माइंड टेकनोलॅाजी के लिए राजी है कि नहीं। माइंड राजी हो तो रूस ने कहां से, किससे फाइनेंस किया है, पिछले पचास सालों में? और 1917 की क्रांति के बाद रूस की हालत हमसे बदतर थी, हमसे बेहतर नहीं थी। तो रूस को तो कोई सहायता नहीं थी दूसरे मुल्कों से; क्योंकि दूसरे मुल्क तो नष्ट करने को तैयार थे रूस को। लेकिन पचास साल में टेक्नालॅाजिकलि वह अमरीका से भी किन्हीं मामलो में आगे हो गया है!

मेरी मान्यता यह है कि जो डेमोक्रसी लोगों को काम करने ने के लिए कंपेल न कर सके, वह निकम्मी डेमोक्रसी है। बिल्कुल निकम्मी डेमोक्रसी है। असल में हम शब्दों से इतना ज्यादा परेशान है। यह मामला कुछ ऐसा हो गया है कि डेमोक्रसी, अगर ठीक से समझी जाए तो वह भी एक समृद्ध समाज का जीवन-व्यवस्था है। एक दरिद्र समाज डेमोक्रसी होने की बात करता है, तो वह वैसे ही है, जैसे कि एक आदमी घर में हवाई जहाज रखने की बात करता है। डेमोक्रसी जो है, वह पूर्ण शिक्षित, समृद्ध, संपन्न समाज की व्यवस्था है। जब तक समाज उतना संपन्न, सुशिक्षित नहीं हो जाता, तब तक डेमोक्रसी का मतलब सिर्फ इतना ही होगा कि वह सदय डिक्टेटरशिप हो। उसका यही मतलब होगा।

 

प्रश्नः क्या डेमोक्रसी नुकसान पहुंचा रही है?

 

उत्तरः बिल्कुल ही, डेमोक्रसी नुकसान पहुंचा रही है, बीस साल में मुल्क को भारी नुकसान पहुंचाई है। आज तो जरूरत है कि हम तीस-चालीस साल तक मुल्कको एक मिल्ट्री कैंप की शक्ल में खड़ा कर के और मेहनत करें, तो हम समृद्ध हो सकते हैं। नहीं तो कोई समृद्धि नहीं हो सकती। यह इस तरह समृद्धि नहीं आने वाली है। बल्कि बीस साल का फल यह हुआ है कि अंग्रेज के समय में हमारी जितनी इफिसिएंसि थी, बहुत नीचे गिर गई है। काम करने की क्षमता भी नीचे गिर गई है, काम करने का मन भी नीचे गिर गया है। कोई काम नहीं करना चाहता। और यह एक ख्याल पैदा हो गया है।

रूस में क्रांति हुई तो वहां एक मजाक चला। जिस दिन 1917 में पहले दिन क्रांति हुई अक्टूबर में और मास्को क्रांतिकारियों के हाथ में चला गया, तो एक मोटी औरत बीच रास्ते पर चलती हुई पाई गई। तो पुलिस के आदमी ने कहा, तुम यह कहां चलीं, बीच में रास्ता चलने का है? उसने कहा अब हम स्वतंत्र हो गए! अब तो हम स्वतंत्र हो गए, अब हमें कोई यह नहीं कह सकता कि बाएं चलो कि दाएं चलो।

स्वतंत्रता का मतलब और लोकतंत्र का मतलब ऐसा ही हम पकडे हुए हैं इधर बीस साल से। नहीं, स्वतंत्रता का मतलब है कि दायित्व और बढ गया है। लोकतंत्र का मतलब है कि हमारी रिस्पोंसबिलिटि और गहरी हो गई है। एक डिलिवरेट डिक्टेटरशिप से ही यह लोकतंत्र आगे बढेगा और डेमोक्रसी बन सकती है। तो हिंदुस्तान मेंअभी पूर्ण लोकतंत्र की बात ही करनी फिजूल है।

प्रश्न कर्ता.. आप कहते हैं कि डिलिवरेट डिक्टेटरशिप से ही लोकतंत्र आगे बढेगा, लेकिन आप अपनी धारणा को स्पष्ट…

उत्तर.. तभी तो धीरे-धीरे बात चल पाती है। नहीं मुझे मौका ही नहीं मिल पा रहा है, ऐसा मुश्किल हो गया है। मुझे इतनी बातों पर बात करनी है, न मंच है, न मौका है। तो यह तो जो लोग मंच बना लेते हैं, वे जैसे ही मंच बना लेते हैं, वह बात मुझे करनी पडती है।

वह तो होगा मैं आपको पूरा इंटरव्यू दूं। और आप चाहें तो मैं पूरा इंटरव्यू दूं, आप उसके लिए बात करें। मैं चाहता हूं, इधर मैं यह कह रहा हूं मित्रों से कि आने वाले दिनों में बंबई में चार दिन इस संबंध में एक चार लिक्चर रखें, तो मैं कुछ कह सकूं। तो जरूरी है और मुझे तो इतना नुकसानदायक लग रहा है डेमोक्रसी किइ बातचीत, कि इतनी खतरनाक है कि हमको नष्ट किए दे रही है। अभी मुल्क को कोई जरूरत नहीं है डेमोक्रसी की।

तो मैं एक डिलिवरेट डिक्टेटरशिप चाहता हूं, एक सदय अधिनायकशाही मुल्क मैं होनी चाहिए और टेक्नालॅाजी पर हमें फोर्स करना पडेगा, क्योंकि मुल्क का इनरशियां पांच हजार साल पुराना है।। आप बिना फोर्स किए कुछ कर नहीं सकते। अगर आप सोचते हों, बस हम कह देंगे कि बर्थ-कंट्रोल कर दो और बर्थ-कंट्रोल हो जाएगा, तो यह हद्द बेवकूफी की बात है। इधर तो जब तक बंदुक सामने नहीं होगी, तो बर्थ-कंट्रोल होने वाला नहीं है। आपने कह दिया कि बस टेकनोलाजी.. तो वह जो चर्खा चलाने वाला आदमी है वह एकदम से आटोमैटिक मशीन पर पहुंच नहीं सकता, उसका माइंड कैसे पहुंच जाएगा? उसको पहुंचाना पडेगा और फोर्स करना पड़ेगा। एक पंद्रह और बीस साल के लिए सारे मुल्क को सैन्य शिविर की तरह व्यवहार करना पडेगा तो फिर हम उस हालत में पहुंचेंगेकि डेमोक्रसी फिर हम ला सकें। तो तकनीक पर मेरा जोर है दूसरा। और तकनीक को बढाने के लिए हमें मुल्क पर दबाव डालना पड़ेगा। ऐसे काम नहीं चलने वाला है।

हां, यूथ फोर्स मैं बना रहा हूं, उसमें मैं इस बात का प्रचार करने का प्रयास करूंगा।

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और तीसरी बात। जिन मुल्कों में भी संपत्ति आई है, वह संपत्ति जैसे लोग सोचते हैं कि कहीं रखी हुई है..संपत्ति कहीं रखी हुई नहीं है, वह तो क्रिेशन है, कैपिटल टु बी क्रिएटेड। कहीं है नहीं कि हम गए और हमने उसको उठाकर कब्जा कर लिया। वह तो क्रिएशन है। तो उसके क्रिएशन करने के लिए मुल्क की जिंदगी की सारी जीवन चर्या को बदलनी पडेगी। यह जीवन-चर्या उसे क्रिएट करने वाली नहीं है, क्योंकि जो हमारा ढंग है अभी..उठने, बैठने, चलने, सोने का, यह उससे पैदा होने वाली नहीं है। हमें पूरी की पूरी जीवन-चर्या मुल्क की बदलनी चाहिए। और इसके लिए खासकर मास्टर्स और विद्यार्थियों में मैं काम करना चाहता हूं। इसलिए कि मैं युवकों को इस योग्य बना सकूं कि वे यह समझें कि कितनी देर में हम कितना पैदा कर सकतें हैं, और कैसे कर सकते हैं, कितने कितने सहयोग से कर सकते हैं। कितने लोगों की जरूरत पडेगी, कितनी मशीन कीजरूरत पडेगी और हम कितने कम समय में कितना ज्यादा पैदा कर सकेंगे। एक यह ध्यान रखना है कि कम शक्ति में, कम समय में, कम श्रम से, अधिकतम कैसे पैदा किया जा सकता है।

 

प्रश्नकर्ताः तो फिर इसे कम्युनिजम कहें?

 

उत्तरः एक तरह से तो कमुनिजम लाना ही पड़ेगा। हां-हां, कम्युन, कम्युन की जरूरत पडेगी। मैं इसके बाबत विचार करता हूं निरंतर कि जरा एक हवा पैदा हो तो मैं पूरे मुल्क में छोटे-छोटे कम्युन बनाऊं, जिनकी सोशल लिविंग हो। बच्चे भी सामूहिक रूप से पालें जाएं, सामूहिक रूप से शिक्षित हों, सारे लोग सामूहिक रूप से फार्मों पर काम करें और टेकनोलॅाजी पर ज्यादा से ज्यादा जोर दें, और आदमी के श्रम को कम से कम उपयोग में लाएं। जितना आदमी का श्रम बचता है उतना श्रम इंटलेक्ट में ट्रांसफार्म होता है, मेरी अपनी समझ यह है। इस मुल्क में इंटलेक्ट विकसित नहीं हो सकी, क्योंकि हम आदमी को सारा का सारा शारीरिक श्रम में लगा देते हैं। एक आदमी आठ घंटे चर्खा चलाएगा तो उसकी बुद्धि विकसित होने वाली नहीं है। उसकी बुद्धि चर्खे टाइप की हो जाने वाली है; उतनी ही उससे ज्यादा नही। जितना शरीर श्रम से हम आदमी को मुक्त करते हैं, उतनी उसकी शक्ति इंटेलिजंस में विकसित होनी शुरू होती है। इंटेलिजंस उन समाजों में विकसित होती है जहां लकजरी पैदा हो सकती है।

 

प्रश्नकर्ताः लेकिन तब इंडीवीजुअल का विकास…

 

उत्तरः इंडीवीजुअल है कहां, आपको सिर्फ ख्याल है! है कहां? इंडीवीजुअल है कहां? आपसे थोडी बाद में बात करूंगा, लेकिन इंडीवीजुअल है नहीं कहीं। अभी भी नहीं है। आपको सिर्फ भ्रम है कि आपसे कांप्लेशन नहीं आ रहा है। आपकी पत्नी आपको खींच रही है, आपके पिता आपको खींच रहे हैं, स्टेट खींच रही है, समाज खींच रहा है, बाप खींच रहा है। आप सिर्फ भ्रम में जी रहे हैं कि आप कंपेल्ड नहीं हैं, आप एक-एक इंच कंपेल्ड हैं। सच तो यह है कि जितना सामुहिक लिविंग होगा और जितना मशीनसेंटर्ड उत्पादन हो जाएगा, उतना ही व्यक्ति को मुक्त किया जा सकता है।

 

प्रश्नः आप किससे प्रभावित हैं? रामकृष्ण परमहंस है, भगवान महावीर और बुद्ध हैं.. इनमें से किसी से भी आप प्रभावित हैं?

 

उत्तरः नहीं, किसी व्यक्ति से म प्रभावित नहीं हूं। लेकिन कुछ-कुछ चीजें सब में हैं जो मुझे प्रीतिकर हैं और मेरा जोड बडा अजीब है। कुछ चीजें मुझे मार्कस में उतनी ही प्रीतिकर है, जितनी बुद्ध में। कुछ मुझे नीत्शे में प्रीतिकर है और गांधी में भी। तो मेरे सामने कोई एक व्यक्ति नहीं है, जो मुझे प्रीतिकर है। सारे जगत की जो देन है, उसमें जो भी मुझे सत्यतर लगता है, चाहे वह किसी से आता हो, तो वह मुझे अंगीकार है। तो मेरे साथ बडी कठिनाई हो गई है। कभी मैं मार्कस की प्रशंसा में भी बोलता हूं, कभी नीत्शे की प्रशंसा में भी बोलता हूं। कभी मैं गांधी के खिलाफ बोलता हूं। कभी बुद्ध की प्रशंसा भी करता हूं और कभी बुद्ध के खिलाफ भी बोलता हूं। कभी रामकृष्ण की प्रशंसा भी करता हूं और कभी खिलाफ भी बोलता हूं। तो लोगों को बहुत मुश्किल हो गई है। मैं किसी व्यक्ति के पक्ष में नहीं हूं। मुझे जो ठीक दिखाई पडता है, वह जिस व्यक्ति में भी दिखाई पडता है, मैं उसकी प्रशंसा करनी शुरू कर देता हूं।

 

प्रश्नकर्ताः तो आप किसी एक से प्रभावित नहीं है?

 

उत्तरः नहीं, बिल्कुल जरा भी नहीं। मुझे तो सारा हेरिटिज पूरी मनुष्यता का प्रीतिकर है। उस पूरे हेरिटिज पर ड्राइव करना है, जो कुछ ड्राइव करना है। उसमें मेरे मन में जरा भी भाव नहीं आता है कि यह मुहम्मद का है, कि क्राइस्ट का है। सारी दुनिया में जो भी मनुष्य ने आज तक सोचा है, उसकी जो भी क्रीम है, वह सब मुझे अंगीकार है; उसमें जो भी श्रेष्ठतर है, सब स्वीकार है। वह चाहे एक ऐसे आदमी ने कहा हो, जो वेश्यागामी है, शराब पीता है, इसकी मुझे फिक्र नहीं है। वह अगर सत्य है तो मुझे अंगीकार है। और चाहे वह ऐसे आदमी ने कहा जो जो शराब नहीं पीता, ब्रह्मचारी है और दिन-रात भजन कीर्तन करता है, लेकिन बेवकूफी की बातकही है, तो वह बेवकूफी की बात है। उसमें मैं फर्क नहीं करता। तो सारी मनुष्यता का जो आज तक का अनुभव है, उस सारे अनुभव से मुझे प्रेम है। उस अनुभव में जो भी श्रेष्ठतर है, उसे मैं हमेशा स्वीकार करता हूं। लेकिन मेरे मन में किसी व्यक्ति का कोई स्थान नहीं है।।

 

प्रश्नकर्ताः इंडस्ट्रलाइजेशन के लिए फॅारिन कैपिटल भी तो नहीं है हमारे पास।

 

उत्तरः असल बात यह है, जो मैंने तीन बातें कही हैं, जब तक वे नहीं हो जातीं…आपको फॅारिन कैपिटल भी मिल जाए तो भी आप इंडस्ट्रलाइज नहीं कर पाएंगे, क्योंकि माइंड का मेकप हमारा इंडस्ट्रियल नहीं है। वह क्रांति नहीं हो सकती यहां, जो औद्योगिक क्रांति पश्चिम में हुई। उस क्रांति के पहले जो रिनेसंस का युग बीता, उसने सारे माइंड को बदल दिया यूरोप के। वैसा कोई रिनेसंस भारत में कभी हुई नहीं। हमारा माइंद तो वही फावडा खुर्पी वाला है..माइंड। और बडी इंडस्ट्री आप खडी भी कर दो, तो वह हम से चलने वाली नहीं है। वह हमसे चलने वाली नहीं है। कैपिटल का सवाल नहीं है कभी भी। मेरे लिए सारा सवाल माइंड का है। एक बार सारा माइंड तैयार हो तो जिन मुल्कों में, यूरोप में इंडस्ट्री बनी, वे कहां से फॅारिन कैपिटल ले आए थे? आज से डेढ सौ साल पहले वह कहां की इंडस्ट्री थी? हम समझ लें कि उसी हालत में हैं। मैं पूछता हूं, यूरोप में डेढ सौ साल पहले कहां से कैपिटल आई, कहां से इंडस्ट्री आई, कहां से टेकनीशियंस आए? कहीं से भी नहीं आए, वह तो उन्हों ने पैदा किया।

 

प्रश्नकर्ताः हमारे सामने तो पापुलेशन का सवाल है?

 

उत्तरः यह सवाल नहीं है। अगर पापुलेशन प्राब्लम उनके सामने बडा होता, तो इंडस्ट्री और बडी आती। माइंड का सवाल है। आपके सामने पापुलेशन प्राब्लेम आज है, पचास पहले तो नहीं था और आपने तब इंडस्ट्री क्यों नहीं पैदा कर ली?

 

प्रश्नकर्ताः गुलाम थे हम उस वक्त।

 

उत्तरः और गुलाम भी आप क्यॅा थे। ये सारे मामले तो इन्टरकनेक्टेड हैं न! आप गुलाम भी क्यों हैं? गुलाम भी आप इसीलिए हुए कि टेकनिकली आप कभी विकसित नहीं हुए। इसलिए जल्दी टेकनिकली ज्यादा विकसित आपके मुकाबले आ गए, आपको हार जाना पडा। आप हैरान होंगे पिछले हजार साल का इतोहास देखकर किजब भी आप हारे, तो जिससे आप हारे, वह कौम आपसे ज्यादा ताकतवर नहीं थी, सिर्फ टेकनिकली आपसे ज्यादा ताकतवर थी!

पहली दफे मुसलमान हिंदुस्तान में आए, तो हिंदुस्तान का राजा हाथी पर लडने गया। वह टेकनिकली बेवकूफ था, घोडे पर लडने वाले से हार जाएगा। घोडे पर लडने वाला टेकनिकली होशियार है, क्योंकि घोडा ज्यादा तेज जानवर है। जल्दी से बचता है, भागता है। हाथी बिल्कुल बेहूदा जानवर है। उस पर आप सवारी निकालिए किसी महाराज की, तो वह ठीक है, लेकिन वह युद्ध के मैदान का जानवर थोडे ही है। तो आप हाथी पर लडने गए, टेकनिकली गलत थी यह बात। घोडे पर लडने वाला जीत गया। जो आए थे लडने, वे आपसे कमजोर कौमें थीं! आपसे ज्यादा ताकतवर कौमें नहीं थीं, न उनकी संख्या ज्यादा थीं, न कुछ था! न उनके पास रोटी थी खाने को, न कुछ और था! सिर्फ टेकनिकली वे आपसे ज्यादा इंप्रूव्ड साधन लेकर आए थे, वे आ गए घोडा लेकर। इसके बाद आप जब भी हारे.. आप बंदूक लेकर लडते तो दूसरा तोप लेकर आ गया। अंग्रेज से हारने का कुल कारण इतना था कि आपके पास बंदूकें थीं, अंग्रेजों के पास तोपें थीं। टेकनिकली वे आपसे ज्यादा होशियार थे। अंग्रेज की ताकत कितनी थी हिंदुस्तान में जीत जाने की? हिंदुस्तान में उतने दूर देश से आकर एक कौम खडी हो जाए, और हमारा नेता बेवकूफी की बातें समझाता है कि चूंकि हममें भेदभाव था! ये बिल्कुल कनिंगनेस की बातें हैं, ये असली बातें नहीं हैं। असली बात यह थी कि आप हमेशा टेकनिकली पीछे थे। जब भी दुश्मन आया सामने, वह टेकनिकली ज्यादा बडा साधन लेकर आया था। आप ठप्प हो गए थे।

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अभी आज भी आप पर चीन आ जाए तो आप हारने ही वाले हैं। यह कहेगा कौन? क्योंकि टेकनिकली चीन से आप पीछे हैं। आप जीत नहीं सकते चीन से। और आप यह पक्का मानिए कि दस साल में आप पाकिस्तान से भी टेकनिकली पीछे हो जाने वाले हैं, क्योंकि आपका पूरा माइंड नान-टेकनिकल है। बडा मजा यह है। अभी आप बडा खुश हो लिए हैं, थोडी सी जीत हो गई। एक दस साल के भीतर आप पाकिस्तान से भी जीतने में समर्थ नहीं रह जाएंगे, क्योंकि टेकनिकली वह आगे निकलता जा रहा है। वह अणु भट्टियां खडी कर रहा है वह सब कर रहा है और यहां बेवकूफ विचार करतें हैं कि अणु बनाना है कि नहीं बनाना है। यही बेवकूफी हजार सालसे गुलाम रखी आपको, क्योंकि बंदूक वाला सोचता था, तोप बनाना है कि नहीं बनाना है, और दूसरा बनाकर आ गया था। उसने नहीं पूछा कि बनानी है कि नहीं बनानी है। और अणु बनाओ कि नहीं बनाओ। कि महावीर स्वामी क्या कहते हैं, बुद्ध भगवान क्या कहते हैं, महात्मा गांधी क्या कहते हैं..ाणु बनाना है कि नहीं बनाना है? अहिंसा की फिलॅासफि क्या कहती है? तुम यह सोचना! दस साल में पाकिस्तान अणु बना लेगा।

 

प्रश्नकर्ताः तो आप पूर्णतः टेकनोलॅाजी के पक्ष में हैं?

उत्तरः बिल्कुल ही पाजिटिवली टेकनोलॅाजी, फार टेकनोलॅाजी। एटम बम का सवाल नहीं है। टेकनोलॅाजिकली हमें श्रेष्ठतम होना चाहिए। हर दिशा में श्रेष्ठतम होना चाहिए। अणु-बम टेकनोलॅाजी का श्रेष्ठतम हिस्सा है, वह हमें बनाना चाहिए। जरूरी नहीं है कि हम लडने जाएं, लेकिन आणविक इनर्जी की टेकनोलॅाजी जान लेनी चाहिए, खडी कर लेनी चाहिए, क्योंकि बच्चों के लिए सवाल कल खड़ा हो सकता है। आइ एम फार टेकनोलॅाजी। इसलिए अणु-बम का सवाल नहीं है, सारी चीजों का सवाल है। अब दुनिया में एलोपेथी विकसित हो रही है, यहां के बेवकूफ आयुर्वेद की बातें किए चले जाते हैं, और उनको गवर्नमेंट सहायता दे रही है! टेकनोलॅाजीकली हर जगह हम बेवकूफी की बातें करते है। यानी दो हजार साल में मेडिकल साइंस कहां से कहां पहुंच गई, वे इधर जडी बूटियों की बातें कर रहे हैं! और गवर्नमेंट दान देगी। औषधालय बनवाओ, और यह करो और आयुर्वेद हमारा है! हमारा तुम्हारा सवाल नहीं है। टेकनोलॅाजिकली कौन आगे है? तो हर चीज में यह देखना है कि कौन आगे है। जब हम सारे जीवन में टेकनोलॅाजी का ध्यान देकर चलेंगे, तो मैं आपसे कहता हूं कि पचास साल में हिंदुस्तान बिना किसी से सहायता लिए खड़ा हो सकता है। लेकिन माइंड का मेकप होना मुश्किल बात है।

 

प्रश्नः आप अपनी बात कनविन्स क्यों नहीं करते?

 

उत्तरः मैं तो जो कह रहा हूं, मैं कहूंगा, अगर उसमें कोई सचाई है तो कनविंस हो जाएगी। यदि कनविंस नहीं होगी, तो मुझे उसकी फिकर नहीं है। मैं तो यह कहता हूं कि टेक्नालॅाजिकली जो मुल्क पीछे है, वह मुल्क गुलाम होने की तैयारी कर रहा है, वह बच नहीं सकता। इसमें कनविंस करने की दिक्कत नहीं है।

 

प्रश्नकर्ताः आपकी सारी बातें युटोपिआ नहीं हैं?

 

उत्तरः नहीं, जरा भी नहीं। बिल्कुल ही प्रेक्टिकल होने की कोशिश करनी है। यह सवाल नहीं है। लेकिन उन्हें, बिना एब्यूज किए पब्लिक का माइंड बदला नहीं जा सकता, क्योंकि वही उसके माइंड को पकडे हुए है।

 

प्रश्नकर्ताः पब्लिक का माइंड बदलने के लिए आपको तो उसके पास आना पडेगा न?

उत्तरः हां, वह तो मैं कोशिश करूं। उसमें आप सहयोगी बनिए। लेकिन सवाल यह है कि अगर हिंदुस्तान का माइंड गांधी की पूजा करता चला जाता है तो मैं मानता हूं कि टेकनिकली हिंदुस्तान विकसित नहीं होगा। ये दोनों बातें जुडीं हुई हैं। क्योंकि गांधी बिल्कुल ही टेक्नालॅाजी के दुश्मन हैं। तो मैं अगर टेक्नालॅाजी के लिए लोगों को विकसित करना चाहता हूं, तो गांधी मुझे आड़े आते हैं और मुझे कोई आड़े नहीं आता। यानी गांधी से मुझे लड़ना पड़ेगा। गांधी अच्छे आदमी हैं, इसमें कोई शक-शुबहा नहीं है। लेकिन अच्छे आदमी को क्या करेंगे? सवाल तो यह है कि वह जो फिलॅासफी खड़ी कर रहे हैं, वह मुल्क के लिए घातक है। तो मुझे तो उनकी बात करनी पेगी। तो जब मैं टेक्नालॅाजी की बात करूं, तो जो भी सीधा सवाल उठाता है, वह फिर पूछता है कि गांधी के बाबत आपका क्या ख्याल है? कि टेक्नालॅाजी की मैं बात करूं, कि ग्रामोद्योग की बात मैं करूं? और मैं मानता हूं किग्रामोद्योग की बात करने वाला मुल्क का हत्यारा है। वह मुल्क को डुबा देगा, मार डालेगा।। ग्रामोद्योग तो चल रहा है पांच हजार साल से और हम मरते जा रहे हैं!

 

प्रश्नकर्ताः आप मानते हैं कि गांधी जी हत्यारे थे मुल्क के, तो आपकी भी क्यों न हत्या कर दी जाए?

 

उत्तरः उसमें कोई हर्जा नहीं। एक दफा मेरी हत्या हो जाए, तो गांधी से मेरी टक्कर सीधी-सीधी हो जाए। मेरा मतलब नहीं समझे आप। नहीं, काम नहीं रुकेगा। एक दफा मेरी हत्या हो जाए तो फिर गांधी से मेरा मुकाबला सीधा-सीधा हो जाए। फिर टेकनोलॅाजी के पक्ष में भी कोई आदमी अगर मरता है, तो मुल्क में विचार शुरू हो जाए। उसमें कोई हर्जा नहीं है। मेरे मरने से क्या फर्क पड़ता है? लेकिन मेरे मरने से पचास लोगों के मन में ख्याल आ सकता है और बात चल सकती है। पच्चीस दूसरे लोग खड़े हो जाएंगे। लेकिन टेकनोलॅाजी के लिए कोई मरे भी तो? टेक्नालॅाजी के लिए कोई मरा नहीं है इस मुल्क में आज तक! कोई हर्जा नहीं है, मर जाएं। यानी मेरे मरने से क्या फर्क पड़ता है।

 

प्रश्नकर्ताः काम रुक जाएगा।

 

उत्तरः कुछ भी नहीं रुकता है। किसके मरने से काम रुकता है? क्राइस्ट मर गए तो कोई काम रुकता है क्रिश्चिएनिटी का? कुछ काम-वाम नहीं रुकता। मार्कस मर गया तो कोई कम्युनिजम रुकता है? आदमी मर जाते हैं और जिन विचारों के लिए मरते हैं, वे विचार बलशाली हो जाते हैं उनके मरने से, वे खाद बन जाते हैं उन विचारों के लिए। उसमें कोई हर्जा नहीं है। उसमें जरा भी हर्ज की बात नहीं है। एक दफा कोई मार ही डाले, तो बडा अहित हो जाए। उससे कोई समस्या नहीं है।

 

प्रश्नकर्ताः एक बात पूछना है आचार्य जी। हम तो देख रहे हैं जहां-जहां कुछ व्यक्तियों से भेंट होती है, वहां-वहां नार्मली…

 

उत्तरः बहुत कुछ किया जा सकता है। यानी मेरी जो बेसिक थीसिस है सारी बातों में। हिंदुस्तान में अच्छे आदमी को राजनीति में नहीं जाना चाहिए, ऐसी धारणा है सदा से! धारणा है इसलिए नहीं आता। वह नहीं आता है, वह अगर आता तो क्यों होता यह सब? यानी मेरा कहना यह है अच्छा कि आदमी राजनीती में नहीं आता है, क्योंकि उसे यह समझाया गया है हमेशा कि अच्छे आदमी को राजनीति में नहीं आना चाहिए। यह तो बदमाशों की चीज है। इस समझाने का परिणाम यह हुआ कि बदमाश ही बदमाश वहां इकट्ठे हो गए हैं। अच्छा आदमी वहां जाता नहीं। और अगर अच्छा आदमी जाए तो आप उसको कहोगे कि तुम भी हो गए गडबड। तो इसकी जरूरत है मुल्क में कि हम अच्छे आदमी को कहें कि तुम आओ राजनीति में। तुम वहां प्रवेश करो, तो हम उसे बदमाशों से बचा सकेंगे।

 

प्रश्नकर्ताः उसके पास साधन नहीं हैं, शक्ति नहीं है, संपत्ति नहीं है।

 

उत्तरः ऐसा जरूरी नहीं है कि अच्छे आदमी के पास साधन नहीं, शक्ति नहीं। अच्छे आदमी के पास भी साधन, शक्ति, संपन्नता है। लेकिन अच्छे आदमी के पास साहस नहीं है।

 

प्रश्नः तो क्या गांधी जी में साहस की कमी थी!

 

उत्तरः वह सिर्फ इसीलिए कि मेंटल मेकप हमारा जो है। मेंटल मेकप हमारा यह है, कि अभी मैं हूं, अगर मैं कल राजनीति में जाता हूं तो वह जो मेरी पूजा करता है, कहेगा, यह भी गडबड हो गए फिर, राजनीति में चले गए। तो गांधी, हिंदुस्तान की हुकूमत हाथ में आ गई, तो गांधी साहस नहीं जुटा पाए कि वह एक्जिक्युटिव बाडी में खडे हो जाएं, किवह प्रधान मंत्री बन जाएं। क्योंकि वह प्रधान मंत्री बनते तो सदा के लिए महात्मा खत्म होगए होते उसी वक्त। वे फिर महात्मा कभी नहीं कहे जा सकते थे। अब महात्मा को बचाना है, कि प्रधान मंत्री बनना हैं?

तो एक अच्छे आदमी थे गांधी मेरी दृष्टि में, आदमी के लिहाज से गांधी एक अच्छे आदमी थे। उनकी अच्छाई में कोई इंच भर की कमी नहीं है। उनकी समझ में कितनी ही गल्तियां हों, उनकी बुद्धिचाहे कितनी ही साधारण हो, लेकिन आदमी बहुत अदभूत थे। लेकिन वह गडबड हो गई बात। अगर गांधी वहां हुकूमत में बैठते तो दो परिणाम होते। एक तो गांधी की अच्छाई का परिणाम होता, और अच्छे लोग पूरे मुल्क के आकर्षित होते और राजनीति तरफ जाते। क्योंकि जब गांधी जाते तो भय टूट जाता। खत्म हो जाती बात। दूसरा यह होता कि गांधी को एक मौका मिलता कि वे जो बात कह रहे थे, उनको प्रयोग करके दिखलाते। या तो वे प्रयोग कर लेते तो मुल्क बदल जाता, और या असफल हो जाते तो हमारी गांधी से झंझट छूट जाती। दो में से कुछ भी फल हो जाता। तो होशियारी हो गई, गांधी वहां से बच गए जाने से। उन्हों ने अपना महात्मापन बचा लिया और राजनीति में वह नहीं गए।

 

प्रश्न कर्ताः तो अच्छा आदमी दिया मुल्क को..नेहरू जैसे आदमी को दिया।

 

उत्तरः जरा भी नहीं दिया। नेहरू और गांधी में जमीन-आसमान का फ र्क है। नेहरू और गांधी में जमीन आसमान के फर्क थे। नेहरू पॅालिटिशियन हैं, गांधी पॅालिटिशियन नहीं हैं। और यही फर्क बुनियादी है। गांधी पॅालिटीशियन नहीं हैं! राजनीतिक बिल्कुल नहीं हैं गांधी। वह एक सीधे सच्चे आदमी हैं। उनको सचाई ज्यादा मूल्यवान है, बजाय राजनीति के। नेहरू तो पॅालिटीशियन हैं। तो नेहरू ने जो पॅालिटिक्स के खेल थे, वह आते ही शुरू कर दिए। वह सारे खेल शुरू हुए। जितने नेहरू के नीचे अच्छे आदमी थे, जिनसे नेहरू को खतरा हो सकता था, उनको धीरे-धीरे कांग्रेस के बाहर फेंकने के सब उपाय कर दिए..चाहे जयप्रकाश हों, और चाहे कृपलानी हों, चाहे कोई हो। जिन लोगों से भी नेहरू को कंपीटीशन का डर था, उनकी जडें काट दी उन्होंने। पॅालिटिशियन हमेशा अपने सेछोटे आदमी को पास रखना पसंद करता है। अपने से बराबर के आदमियों से बात नहीं करता। क्योंकि उससे कल खतरा है। कल वह जगह ले सकता है, छीन सकता है। तो चाहे राजगोपालाचार्य हों, चाहे जयप्रकाश हों, चाहे कोई भी हो..धीरे-धीरे एक-एक आदमी की जड काट कर सारे अच्छे आदमियों को, कीमती आदमियों को अलग कर दिया। दो कौडी के आदमी धीरे-धीरे उनकी जगह बिठाल दिए, जो कि हमेशा जी-हजूरी करें।

मुल्क में बदमाशों को इकट्ठा करने का काम नेहरू के ऊपर है।

इसमें इस जिम्मे से उनको बचाया नहीं जा सकता। क्योंकि सारे अच्छे आदमियों की जडें काट डालीं। और सारे साधारण आदमियों को ऊपर ले आए, क्योंकि वे हमेशा जी हजूरी करेंगे। राजनीति का माइंड यह है कि हमेशा अपने से छोटे आदमी की भीड को चारों तरफ से घेर कर रखो। अपने मुकाबले का आदमी कभी साथ न आ जाए। तो नेहरू और गांधी में तो जमीन आसमान के फर्क हैं।

अगर गांधी ने हिंमत जुटाई होती, तो यह कभी नहीं हो सकता था कि जयप्रकाश, कृपलानी और राजगोपालाचारी कांग्रेस के बाहर जाते। असंभव था। यह बिल्कुल ही असंभव था। हिंदुस्तान के सारे अच्छे आदमी गांधी के साथ खडे होते। हिंदुस्तान की हुकूमत दूसरी शक्ल की हुकूमत बनती। उसमें नेहरू भी होते, उसमें एक जयप्रकाश भी होते, उसमें लोहिया भी होते, उसमें राजगोपालाचारी भी होते। उसमें मुलक के सारे अच्छे लोग होते, एक शक्ल बदल जाती हिंदुस्तान की। लेकिन गांधी महात्मापन को बचा गए, हिंदुस्तान को डुबा गए! उनके तो सामने तो विकल्प सीधा है कि करना क्या है, क्योंकि सारा मुल्क कहता कि अरे बस, डावांडोल हो गए! और जैसे ही गांधी ने हाथ में सता नहीं ली, सारे मुल्क ने कहा, यह है सच्चा महात्मा! और पता नहीं कि सच्चा महात्मा कितना मंहगा पड़ गया यह हमारे लिए!

 

प्रश्नः आप गांधी जी और नेहरू जी में न केवल कर रहे हैं, वरन उनके व्यक्तित्व, शक्ति पर भी आप…

 

उत्तरः मैं समझा, मैं समझा। गांधी और नेहरू में मैं जो फर्क कर रहा हूं, वह फर्क यही कर रहा हूं कि गांधी के व्यक्तित्व के साथ बहुत से बड़े लोग खडे हो सकते हैं। नेहरू के व्यक्तित्व के साथ बहुत से बड़े लोग खड़े नहीं हो सकते। यह मैं नहीं कहता हूं कि गांधी के साथ खड़े हो सकते थे। एम. एन. राय खड़े नहीं हो सकते थे, सुभाष खड़े नहीं हो सकते थे। लेकिन ये बहुत इक्के-दुक्के मामले थे। और गांधी इतने कुशल और समझदार आदमी थे कि सुभाष को भी खड़ा कर सकते थे। यह इतनी कठिनाई नहीं थी।

गांधी अगर सत्ता में गए होते, तो हिंदुस्तान की सत्ता की पूरी शक्ल बदल गई होती। नीचे से ऊपर तक के मुल्क का सारा ढांचा बदल गया होता। और सारे मुल्क से जिन लोगों को जाने का मौका मिलता, वह दूसरे तरह के लोग होते। वह टाइम बदल गया होता। और वह गांधी हिम्मत नहीं जुटा पाए, और हमने नहीं जुटाने दी हिंमत! सारे मुल्क को कंपेल करना था गांधी को कि हम आपको भेजेंगे, आपको जाना चाहिए। लेकिन सारा मुल्क खुश हुआ कि महात्मा हमारा कितना सच्चा है कि आ गई राजगद्दी हाथ, और लात मार दी! क्योंकि हजारों साल से यह माइंड है कि राजगद्दी को जो लात मार दे, वह बड़ा ऊंचा आदमी है, चाहे उसका कल कुछ भी हो।

तो मैं कहता हूं, मेरे लिए सारा चिंतन जो है बेसिक, वह यह कि पूरे माइंड का फ्रेम हमारा बदले। अच्छा आदमी राजनीति में पहुंचाना चाहिए। तो मेरी दृष्टि है कि गांव-गांव में नागरिक समिति होनी चाहिए, मोहल्ले-मोहल्ले में। काम बढ़े तो मैं चाहता हूं कि एक-एक गांव में नागरिक समिति हो। वह नागरिक समिति यह तय करे कि जो आदमी अपने तरफ से खड़ा हो जाएगा और कहे कि मैं अच्छा हूं, उम्मीदवार हूं, उसको हम वोट नहीं देंगे। इसको हम डिसक्वालीफिकेशन समझेंगे कि यह आदमी खुद अपने को कहता है कि मैं अच्छा उम्मीदवार हूं, मुझको भेजो! नागरिक समिति अच्छे लोगों सेप्रार्थना करेगी कि खडे हो जाएं, और आप खडे होते हैं तो नागरिक समिति आपका समर्थन करेगी। न हम दल की फिकर करना चाहते हैं कि तुम किस दल के हो। तुम अच्छे आदमी हो, तुम चिंतनशील हो, हम तुम्हें भेजना चाहते हैं। अगर पंद्रह बीस वर्ष मुल्क के कोने-कोने में नागरिक समितियां हैं, जो आदमियों को एप्रोच करे और कहे कि इस आदमी को हम खड़ा करना चाहते हैं, और इसको नागरिक समिति पूरा समर्थन देगी। और कोई दल का हम विचार नहीं करते..किसी का हो, कम्युनिस्ट हो, कांग्रेसी हो, सोशलिस्ट हो। आदमी अच्छा हो..यह हम अनुभव करते हैं, तो इसको हम भेजेंगे।

तो अच्छे आदमियों को बीस साल तक मुल्क से हमें भेजने की चेष्ठा करनी चाहिए। और एक फिकर करनी चाहिए कि अच्छा आदमी धीरे-धीरे बुरे आदमी को रिप्लेस कर दे। अभी यह हो रहा है कि अच्छे आदमी को बुरा आदमी रिप्लेस कर रहा है! बुरा आदमी एक दफा जब अच्छे आदमी को हटाता है तो उसका परिणाम यह होता है कि पांच साल बाद उससे भी बुरा आदमी उसको हटा सकेगा। उससे और बुरा आदमी हटा सकेगा। और हर पांच साल में हिंदुस्ताम और गुंडों के हाथ में चला जाएगा, क्योंकि जो वहां बैठा है, उसको अब इससे बड़ा गुंडा ही हटा सकता है, इससे छोटा गुंडा नहीं हटा सकता। तो हर पांच साल में हिंदुस्तान पूरा गुंडाइज्म का मुल्क होगा, जहां अच्छे आदमी को तो जाने का सवाल नहीं है, जीना मुश्किल हो जाएगा। तो कुछ सचेत होना पड़ेगा और कुछ करना पड़ेगा। उसके सामने तो हम नागरिक समितियां खड़ी करेंगे। अच्छे आदमी को प्रोत्सान दें, अच्छे आदमी को हिंमत दें और इस बात की हवा पैदा करें कि यह अच्छे आदमी का कर्तव्य है कि वह राजनीति में जाए, यह ड्युटी का हिस्सा है।

 

प्रश्नकर्ताः लेकिन समय बहुत लगेगा?

 

उत्तरः यह कोई चिंता की बात नहीं है। जो हम कर सकें, वह हमें करना चाहिए। वह कितने दिन में हम कर सकते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई जिनको ठीक लगेगा, वे पकड़ लेंगे। हम उतरते चले जाएंगे। आदमी की उम्र बड़ी कीमती नहीं है बहुत। लेकिन आदमी अगर पचास साल भी हिंमत से सत्य के लिए कुछ करे तो अपनी जिंदगी में ही परिणाम देख सकता है।

प्रवचन - ७ नये  भारत की खोज




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