प्रवचन 26 : श्रद्धा है द्वार - गीता दर्शन

 

गीता-दर्शन – भाग एक
श्रद्धा है द्वार—(अध्‍याय—3) प्रवचन—अठवां
ओशो गीता दर्शन
ओशो गीता दर्शन

ये मे मतमिदं नित्‍यमनुलइष्ठन्ति मानवा: ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्‍यन्तेऽक्किर्मभि:।।31।।

येन्वेतदध्यसूयन्तो नानुतिष्ठीन्त मे मतम्।
सर्व ज्ञानविमूढांस्‍तान्‍विद्धि नष्टानचेतस: ।।32।।

सदृशं चेष्टते स्वक्ष्या: प्रकृर्न्तोनवानीय।
प्रकृति यान्ति भूतानि निग्रह: किं करिष्यीत ।।33।।


और हे अर्जुन जो कोई भी मनुष्य दोषबुद्धि से रहित और श्रद्धा से युक्त हुए सदा ही मेरे हम मत के अनुसार वर्तते है।

वे पुरुष संपूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं। और जो दोषदृष्टि वाले मूर्ख लोग इस मेरे मत के अनुसार नहीं बर्तते है, उन संपूर्ण ज्ञानों में भ्रमित चित्त वालों को तू कल्याण मार्ग ते भ्रष्ट हुए ही जान।

क्योंकि सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात अपने स्वभाव से परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान भी अपनी कृति के अनुसार चेष्टा करता है। फिर हममें किसी का हठ क्या करेगा!

कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो मैंने कहा है, श्रद्धापूर्ण हृदय से उसे अंगीकार करके जो जीता और कर्म करता है, वह समस्त कर्मों से मुक्त हो जाता है, वह समस्त कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है।

श्रद्धा शब्द को थोड़ा समझेंगे, तो इस सूत्र के हृदय के द्वार खुल जाएंगे। श्रद्धा शब्द के आस—पास बड़ी भ्रांतियां हैं। सबसे बड़ी भ्राति तो यह है कि श्रद्धा का अर्थ लोग करते हैं, विश्वास, बिलीफ; या कुछ लोग श्रद्धा का अर्थ करते हैं, फेथ, अंधविश्वास। दोनों ही अर्थ गलत हैं। क्यों 1: जो भी विश्वास करता है, उसके भीतर अविश्वास सदा ही मौजूद होता है।

असल में अविश्वासी के अतिरिक्त और कोई विश्वास करता ही नहीं है। यह उलटी लगेगी बात। लेकिन विश्वास की जरूरत ही इसलिए पड़ती है कि भीतर अविश्वास है। जैसे बीमार को दवा की जरूरत पड़ती है, ऐसे अविश्वासी चित्त को विश्वास की जरूरत पड़ती है। भीतर है संदेह, भीतर है अविश्वास, उसे दबाने के लिए विश्वास, बिलीफ को हम पकड़ते हैं।

श्रद्धा विश्वास नहीं है। भीतर अविश्वास हो और उसे दबाने के लिए कुछ पकड़ा हो, तो उसका नाम विश्वास है। और भीतर अविश्वास न रह जाए, शून्य हो जाए, तब जो शेष रह जाती है, वह श्रद्धा है। भीतर अविश्‍वास हो…… एक आदमी को विश्वास न हो कि ईश्वर है और विश्वास करे, जैसा कि अधिक लोग किए हुए हैं, विश्वास बिलकुल नहीं है, लेकिन किए हुए हैं। विश्वास भी नहीं है, अविश्वास करने की हिम्मत भी नहीं है। भीतर अविश्वास है गहरे में, ऊपर से विश्वास के वस्त्र ओढ़े हुए हैं। ऐसी बिलीफ, ऐसा विश्वास स्किनडीप, चमड़ी से ज्यादा गहरा नहीं होता। जरा जोर से खरोंचो, भीतर का अविश्वास बाहर निकल आता है।

श्रद्धा का ऐसा अर्थ नहीं है। श्रद्धा बहुत ही कीमती शब्द है। श्रद्धा का अर्थ है, जहां से अविश्वास नष्ट हो गया—विश्वास आ गया नहीं। श्रद्धा का अर्थ है, जहा अविश्वास नहीं रहा। जब भीतर कोई अविश्वास नहीं होता, तब श्रद्धा फलित होती है। कहें, श्रद्धा अविश्वास का अभाव है। एकेंस आफ डिसबिलीफ, प्रेजेंस आफ बिलीफ नहीं, विश्वास की उपस्थिति नहीं, अविश्वास की अनुपस्थिति। इसलिए कोई आदमी कितना ही विश्वास करे, कभी श्रद्धा को उपलब्ध नहीं होता। उसके भीतर अविश्वास खड़ा ही रहता है और काटे की तरह चुभता ही रहता है।

अब एक आदमी कहे चला जाता है, आत्मा अमर है; और फिर भी मरने से डरता चला जाता है। एक तरफ कहता है, आत्मा अमर है, दूसरी तरफ मरने से भयभीत होता है। यह कैसा विश्वास है? इसके पीछे अविश्वास खड़ा है। कहता है, आत्मा अमर है, और डरता है मरने से। अगर आत्मा अमर है, तो मरने का डर? मरने का डर बेमानी है। अब यह कैसे आश्चर्य की बात है!

लेकिन अगर ठीक से देखेंगे, तो आश्चर्य नहीं मालूम पड़ेगा। सौ में निन्यानबे मौकों पर संभावना यही है कि चूंकि मरने का डर है, इसलिए आत्मा अमर है, इस विश्वास को किए चले जाते हैं। डर है भीतर कि मर न जाएं, तो आत्मा अमर है, इस पाठ को रोज—रोज पढ़े चले जाते हैं, दोहराए चले जाते हैं, आत्मा अमर है, समझाए चले जाते हैं अपने को, आत्मा अमर है। और भीतर जिसे दबाने के लिए आप कह रहे हैं, आत्मा अमर है, वह मिटता नहीं। वह भय और गहरे में सरकता चला जाता है। हमारे सारे विश्वास ऐसे ही हैं।

कृष्ण भी कह सकते थे, विश्वासपूर्वक जो मेरी बात को मानता है, वह कर्म से मुक्त हो जाता है। उन्होंने वह नहीं कहा। यद्यपि गीता के अर्थ करने वाले वही अर्थ किए चले जाते हैं। वे लोगों को यही समझाए चले जाते हैं, विश्वास करो। कृष्ण कह रहे हैं, श्रद्धा, विश्वास नहीं। विश्वास दो कौड़ी की चीज है। श्रद्धा की कोई कीमत ही आकनी मुश्किल है। उदाहरण के लिए थोड़ा समझाऊं।

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विवेकानंद खोजते थे कि परमात्मा है या नहीं है। खबर मिली—रवींद्रनाथ के दादा महर्षि थे—खबर मिली कि महर्षि गांव में आए हैं। नाव पर, बजरे में वे साधना करते हैं। रात, आधी रात किसी मित्र ने कहा बारह बजे। आपसे कहा होता, तो आप कहते, सुबह उठकर चल पड़ेंगे; सुबह मिल लेंगे। पर विवेकानंद आधी रात ही गंगा पार करके बजरे पर चढ़ गए। धक्का दिया, दरवाजा खुल गया। महर्षि ध्यान कर रहे थे। ध्यान उचट गया। विवेकानंद ने जाकर कोट का कालर पकड़ लिया और कहा, ईश्वर है?

अब ऐसे जिज्ञासाएं नहीं की जातीं! ये कोई शिष्ट बातें नहीं हैं। लेकिन जो परमात्मा के लिए दीवाने हैं, वे शिष्टाचार के लिए नहीं रुक पाते हैं। कोई भी दीवाना नहीं रुक पाता है। महर्षि ने कहा, बैठो भी, यह भी कोई ढंग है! अंधेरी रात, पानी से तर—बतर, नदी में तैरकर आया हुआ युवक, आकर गर्दन पकड़ ले और कहे, ईश्वर है? महर्षि ने कहा, बैठो भी। पर विवेकानंद ने कहा कि नहीं, जवाब मिल गया। आपकी झिझक ने कह दिया कि आपको पता नहीं है। अन्यथा मैं पूछता हूं ईश्वर है? और आप देखते हैं कि मेरे कपड़े पानी में भीगे हुए हैं। और मैं पूछता हूं ईश्वर है? और आप देखते हैं कि आधी रात है। मैंने नहीं देखी, जो अभी खोज रहा है। तो जिसको मिल गया है, वह क्या खाक देखेगा कि आधी रात है! कूद पड़े वापस। महर्षि ने बहुत बुलाया कि युवक, ठहर! जवाब लेकर जा। विवेकानंद ने पानी से कहा कि जवाब मिल गया। ‘ झिझक ने सब कह दिया कि अभी कुछ पता नहीं है।

फिर यही विवेकानंद कुछ महीनों के बाद रामकृष्ण के पास गए। भक्त इकट्ठे थे, बीच में घुसकर जाकर उनके पास खड़े होकर कहा, ईश्वर है? उसी तरह जैसे उस दिन रात महर्षि को पकड़कर कहा था, ईश्वर है? रामकृष्ण ने यह नहीं कहा कि है या नहीं। रामकृष्ण ने जवाब में ही जवाब दिया और कहा, तुझे जानना है? विवेकानंद ने लिखा है कि वे आंखें, रामकृण का वह कहना कि तुझे जानना है? फिक्र छोड़ इसकी कि है या नहीं। तुझे जानना है, यह बता, तो मैं तैयार हूं। विवेकानंद ने लिखा है कि मैंने महर्षि को दिक्कत में डाल दिया था। रामकृष्ण ने मुझे दिक्कत में डाल दिया। मैंने यह सोचा ही न था कि कोई इतने जोर से पकड़कर कहेगा कि तेरी तैयारी है, देखना है, जानना है? यह मत पूछ। मैं दिखाने को तैयार हूं।

रामकृष्ण एक श्रद्धा से बोल रहे हैं, जहां सब अविश्वास गिर गए हैं। महर्षि देवेंद्रनाथ बोलते भी, तो विश्वास से बोलते, जहां सब अविश्वास भीतर किसी कोने में मौजूद प्रतीक्षा कर रहे हैं। श्रद्धा का अर्थ है, ऐसा हृदय जहां विरोध में कोई भी स्वर नहीं है। जहां जो है, वह पूरी तरह से है, जिसके विपरीत कुछ है ही नहीं। जिससे अन्य का कोई अस्तित्व नहीं है। जिससे भिन्न का कोई सवाल नहीं है। जो है, है; पूरा है, टोटल है। श्रद्धा का अर्थ है, हृदय की समग्रता।

कृष्ण कह रहे हैं कि श्रद्धापूर्वक, हृदय की समग्रता से, जिसके भीतर विपरीत कुछ स्वर ही नहीं है, जिसके भीतर अविश्वास की रेखा भी नहीं है, वही व्यक्ति इस मार्ग पर चलकर कर्मों को क्षीण करके मुक्त हो जाता है।

तो पहला फर्क विश्वास और श्रद्धा में ठीक से समझ लें। और आपके पास जो हो, उसे जरा ठीक से देख लें। वह विश्वास है या श्रद्धा है? और ध्यान रहे, अविश्वासी तो कभी श्रद्धा पर पहुंच भी सकता है, विश्वासी कभी नहीं पहुंच पाता है। उसके कारण हैं। जिस आदमी के हाथ में कुछ भी नहीं है, कंकड़—पत्थर भी नहीं हैं, वह आदमी हीरों की खोज कर सकता है। लेकिन जिस आदमी ने कंकड़—पत्थर के रंगीन टुकड़ों को समझा हो हीरे—जवाहरात और उन पर मुट्ठी बांधे रहे, वह कभी हीरों की खोज पर ही नहीं निकलता है। अविश्वासी तो किसी दिन श्रद्धा को पा सकता है। उसके कारण हैं। क्योंकि अविश्वास में जीना असंभव है, इंपासिबल है। अविश्वास आग है, जलाती है, पीड़ा देती है, चुभाती है, अंगारे हैं उसमें। अविश्वास में कोई भी खड़ा नहीं रह सकता। उसे आज नहीं कल या तो श्रद्धा में प्रवेश करना पड़ेगा या विश्वास में प्रवेश करना पड़ेगा।

ध्यान रहे, श्रद्धा का विरोध अविश्वास से नहीं है, श्रद्धा का विरोध विश्वास से है। बिलीफ करने वाले लोग कभी भी श्रद्धा को उपलब्ध नहीं होते हैं। यह बहुत उलटी—सी बात लगेगी। क्योंकि हम तो सोचते हैं, पहले विश्वास करेंगे, फिर धीरे — धीरे श्रद्धा आ जाएगी। ऐसा कभी नहीं होता। क्योंकि जिसने विश्वास कर लिया, वह झूठी श्रद्धा में पड़ जाता है। और झूठे सिक्के असली सिक्कों के मार्ग में अवरोध बन जाते हैं। आप ठीक से जांच कर लेना कि आपके पास जो है, वह विश्वास है कि श्रद्धा है।

और ध्यान रहे, विश्वास सदा मिलता है दूसरों से, श्रद्धा सदा आती है स्वयं से। एक आदमी हिंदू है, यह विश्वास है, श्रद्धा नहीं, क्योंकि अगर वह मुसलमान के घर में रखकर बड़ा किया गया होता, तो मुसलमान होता। एक आदमी मुसलमान है, यह विश्वास है, है, श्रद्धा नहीं; क्योंकि वह ईसाई के घर में रखकर बड़ा किया गया होता, तो ईसाई होता। और एक आदमी आस्तिक है; यह विश्वास है, श्रद्धा नहीं। वह रूस में अगर पैदा हुआ होता, तो नास्तिक हो गया होता। जो हमें बाहर से मिल जाता है, वह विश्वास है। जो हमारे भीतर से जन्मता है, वह श्रद्धा है।

इसलिए और तीसरी बात, विश्वास हमेशा मुर्दा होता है, डेड। श्रद्धा सदा जीवंत होती है, लिविंग। और मुर्दे आपको डुबा सकते हैं, पार नहीं करवा सकते। मरे हुए विश्वास सिर्फ डुबा सकते हैं, पार नहीं करवा सकते। और मरे हुए विश्वास जंजीर बन सकते हैं, मुक्ति नहीं बन सकते। और मरे हुए विश्वास बांध सकते हैं, खोल नहीं सकते। इसलिए कृष्ण जब कह रहे हैं, श्रद्धापूर्वक, तो विश्वास को बिलकुल काट डालना; विश्वास से कुछ लेना-देना कृष्ण का नहीं है। विश्वास-जिनके पास श्रद्धा नहीं है, वे अपने को श्रद्धा का धोखा देते हैं विश्वास से। जैसे आपके पास असली मोती नहीं हैं, तो इमिटेशन के मोती गले में डालकर घूम लेते हैं। किसी को धोखा नहीं होता। मोती को तो धोखा होता ही नहीं। उसको तो पता ही है! आपको भी धोखा नहीं होता। आपको भी पता है। और जिनको आप धोखा दे रहे हैं, उनको धोखा देने से कोई प्रयोजन नहीं है। उनको कोई प्रयोजन नहीं है। विश्वास आरोपित है, श्रद्धा जन्मती है। यह फर्क है।

दूसरी बात, अगर श्रद्धा जन्मती है, तो आ कैसे जाएगी? विश्वास तो उधार लिया जा सकता है, बारोड हो सकता है। सब बारोड है। कोई बाप से, कोई गुरु से, कोई कहीं से, कोई कहीं सै उधार ले लेता है, विश्वास बना लेता है। बिना विश्वास के जीना बहुत मुश्किल है। मुश्किल इसीलिए है कि अविश्वास में जीना मुश्किल है।

और इसलिए एक अदभुत घटना घटती है कि नास्तिक को हम अविश्वासी कहते हैं। कहना नहीं चाहिए। नास्तिक पक्का विश्वासी होता है ईश्वर के न होने में। नास्तिक भी अविश्वास में नहीं जीता, नकारात्मक, निगेटिव बिलीफ में जीता है। उसका भी पक्का विश्वास होता है और वह भी लड़ने-मारने को तैयार हो जाता है। अगर आप कहो कि ईश्वर है, तो उसके ईश्वर नहीं होने की धारणा को चोट लगे, तो वह भी लड़ने को तैयार हो जाता है।

नास्तिक के अपने विश्वास हैं। आस्तिक से उलटे हैं, यह दूसरी बात है, पर उसके अपने विश्वास हैं। उनके बिना वह भी नहीं जीता। कम्मुनिस्ट भी नहीं जीता बिना विश्वासों के। हौ, उसके विश्वास और तरह के हैं। यह बिलकुल दूसरी बात है, इससे कोई भी फर्क नहीं पड़ता है। बिना विश्वास के जीना मुश्किल है। अविश्वास इतनी तकलीफ पैदा कर देता है कि आपको श्रद्धा की यात्रा करनी ही पड़ेगी। लेकिन आप विश्वास…….।

इसे थोड़ा दो-चार आयाम से देखना पड़े। और धार्मिक चित्त को इसे समझ लेना बहुत ही आधारभूत है।

विश्वास और अविश्वास दोनों ही तर्क से जीते हैं। विश्वास भी, अविश्वास भी, दोनों का भोजन तर्क है। नास्तिक तर्क देता है, ईश्वर नहीं है। आस्तिक तर्क देता है, ईश्वर है। लेकिन दोनों तर्क देते हैं और दोनों का तर्क पर भरोसा है। सेंट एनसैन के आपने ईश्वर के लिए प्रमाण सुने होंगे। सारी दुनिया के आस्तिकों ने, ईश्वर है, इसके प्रमाण दिए हैं। नास्तिकों ने प्रमाणों का खंडन किया है कि ईश्वर नहीं है। विश्वास, अविश्वास दोनों ही तर्क से चलते हैं। और श्रद्धा, श्रद्धा इस अनुभूति का नाम है कि तर्क ना-काफी है, नाट इनफ। तर्क पर्याप्त नहीं है, इस प्रतीति से श्रद्धा की शुरुआत होती है। जिस मनुष्य को जीवन में गहरे देखकर ऐसा दिखाई पड़ता है कि तर्क की सीमा है और जीवन तर्क की सीमा के आगे भी है। जिस व्यक्ति को ऐसा दिखाई पड़ता है कि तर्क थोड़ी दूर तक चलता है और फिर नहीं चलता। जिसे अनुभव होता है कि जीवन में बहुत कुछ है जो तर्क के बाहर पड़ जाता है, जो तर्क में नहीं है। जीवन खुद तर्क के बाहर है। जीवन खुद अतर्क्य है, इल्लाजिकल है। आप न होते, तो आप किसी से भी नहीं कह सकते थे कि मैं क्यों नहीं हूं? आप हैं, तो आप किसी से पूछ नहीं सकते कि मैं क्यों हूं?

जिंदगी बिलकुल अतर्क्य है। जिंदगी के पास कोई तर्क नहीं है। हैं तो हैं, नहीं हैं तो नहीं हैं। प्रेम अतर्क्य है, प्रार्थना भी अत्तर्क्यहै। जीवन में जो भी गहरा और महत्वपूर्ण है, वह तर्क से समझ में आता नहीं, पकड़ में आता नहीं, तर्क चुक जाता है और जीवन बाहर रह जाता है। ऐसे अनुभव से पहली बार श्रद्धा की ओर कदम उठते हैं। कैसे पता चलता है कि जीवन अतर्क्य है? कैसे पता चलता है कि बुद्धि थक जाती है और जीवन नहीं चुकता? आदमी कितना सोचता है, कितना सोचता है, फिर कहीं नहीं पहुंचता। सिद्धात हाथ में आ जाते हैं कोरे, राख, अनुभव कोई भी हाथ में नहीं आता। सब गणित हार जाते हैं; कुछ अनजाना पीछे शेष रह जाता है; अननोन सदा ही पीछे शेष रह जाता है। जो हम जानते हैं, वह बहुत क्षुद्र है। जो हमारे जानने के क्षुद्र को घेरे हुए है अनजाना, वह बहुत विराट है।

अठारहवीं सदी का वैज्ञानिक सोचता था कि सौ वर्ष में वह घटना घट कि ट में जानने को कछ भी शेष नहीं रहेगा। उसे पक्का विश्वास था विज्ञान पर। सौ साल पहले वैज्ञानिक को पक्का विश्वास था विज्ञान पर, कि हम सब जान लेंगे, जो भी अनजाना है, जान लिया जाएगा। आज वैज्ञानिक कहता है कि जो हमने जाना, वह तो कुछ नहीं, लेकिन जितना हमने जानने की कोशिश की, उससे हजार गुना अनजाना प्रकट हो गया है। एक इंच हम जानते हैं, हजार इंच और खुल जाते हैं, जो अनजाने हैं। एक सवाल हल होता है, हजार सवाल खड़े हो जाते हैं। और अब वैज्ञानिक हिम्मत बांधकर नहीं कह पाता कि हम कभी भी सब जान लेंगे। अब वह इतना ही कह पाता है कि हम जो भी जानेंगे, वह उसके मुकाबले ना—कुछ होगा, जो अनजाना छूट जाएगा। विज्ञान सौ साल में हारा। दार्शनिक हजारों साल कोशिश करके हार गए और उन्होंने कहा, कुछ है, जो विचार के बाहर छूट जाता है। इस बात की प्रतीति कि कुछ है, जो विचार के बाहर छूट जाता है, श्रद्धा के जन्म का पहला अंकुर है।

क्या आपको जीवन रहस्य मालूम पड़ता है, मिस्ट्री? तो आपकी जिंदगी में श्रद्धा पैदा हो सकती है। और ध्यान रखें, विश्वासी को जिंदगी मिस्ट्री नहीं मालूम पड़ती है। उसके लिए तो सब खुला हुआ मामला है। सब गणित साफ है। वह कहता है, यहां स्वर्ग है, यहां नर्क है; यहां मोक्ष है, यहां भगवान बैठा हुआ है। यहां यह हो रहा है, वहां वह हो रहा है। सब नक्यग़ साफ है। विश्वासी के पास पूरा गणित है, पूरा मैप है, सब सिद्धात हैं, सब साफ है। विश्वासी कभी भी रहस्य में नहीं होता। जो आदमी रहस्य में होता है, वह श्रद्धा में जा सकता है। मिस्ट्री श्रद्धा का द्वार है। तर्क, गणित, प्रमाण विश्वासों के द्वार हैं। उनसे हम विश्वास निर्मित कर लेते हैं। क्या आपको जिंदगी में रहस्य मालूम होता है? क्या आपको लगता है कि हम कुछ भी नहीं जानते? तो आपकी जिंदगी में श्रद्धा पैदा हो सकती है। क्या अर्जुन से कह रहे हैं, जो श्रद्धापूर्वक अर्थात जो जीवन के रहस्य को अंगीकार करता है.।

और जो जीवन के रहस्य को अंगीकार करता है, उसके पास संदेह का उपाय नहीं बचता। यह भी समझ लेना जरूरी है। आप में संदेह तभी तक उठते हैं, जब तक आप विश्वास को पकड़ते हैं, क्योंकि सब संदेह विश्वास के खिलाफ उठते हैं। जिस आदमी का कोई विश्वास नहीं, उसके भीतर कोई संदेह भी नहीं पैदा होता। संदेह पैदा होते हैं विश्वास के खिलाफ।

आपने विश्वास किया कि परमात्मा ने दुनिया बनाई, तब सवाल उठता है, क्यों बनाई! एक विश्वास हुआ कि सवाल खड़ा हुआ, क्यों बनाई! फिर दूसरा सवाल उठता है कि ऐसी क्यों बनाई, जिसमें इतना दुख है! फिर तीसरा सवाल उठता है कि जब वही बनाने वाला है, तो इस सब दुख को क्यों नहीं मिटा देता! फिर सवाल उठते चले जाते हैं। आपने तय किया कि ईश्वर ने दुनिया नहीं बनाई। तब फिर सवाल उठता है, फिर कैसे बनी? तो फिर वैज्ञानिक खोजता है कि नेबुला, और अणु, और परमाणु और उन सबसे दुनिया बनती है। लेकिन वे अणु—परमाणु कहां से आते हैं? और तब सवालों की यात्रा फिर शुरू हो जाती है। हर विश्वास सवालों की यात्रा पर ले जाता है। लेकिन रहस्य का बोध सवालों को गिरा देता है और मिस्ट्री में, रहस्य में डुबा देता है। और जब कोई व्यक्ति रहस्य में डूबता है, तो श्रद्धा अंकुरित होती है।

जैसे बीज को अगर पत्थर पर रख दें, तो कभी अंकुर न आएगा। जीसस कहा करते थे कि मैं एक मुट्ठीभर बीज फेंक दूं अंधेरे में; कुछ पत्थर पर गिरे, कुछ रास्ते पर गिरे, कुछ खेत की मेडु पर गिरे, कुछ खेत के बीच की भूमि में गिर जाएं। जो पत्थर पर गिरेंगे, वे पड़े ही रहेंगे, वे कभी अंकुरित न होंगे। जो रास्ते पर गिरेंगे, वे अंकुरित होना भी चाहेंगे, रास्ता उन्हें अंकुरित होने के लिए सहायता भी देगा। तो इसके पहले कि वे अंकुरित हों, किन्हीं के पैर उनकी संभावनाओं को नष्ट कर जाएंगे। खेत की मेडु पर जो बीज गिरेंगे, वे अंकुरित हो जाएंगे। लेकिन मेड से लोग कभी न कभी गुजरते हैं, वे भी बच न सकेंगे। खेत के ठीक बीच में जो बीज पड़ गए हैं, वे अंकुरित भी होंगे, बड़े भी होंगे, फूल को उपलब्ध भी होंगे।

श्रद्धा का बीज जब रहस्य की भूमि में गिरता है, तभी अंकुरित होता है। रहस्य की भूमि में श्रद्धा अंकुरित होती है। और श्रद्धावान ही— और ध्यान रहे, श्रद्धावान से मेरा मतलब कभी भी भूलकर विश्वास करने वाला नहीं है—श्रद्धावान अर्थात वह जो जीवन को रहस्य की भांति अनुभव करता है। ऐसा व्यक्ति, कृष्ण कहते हैं, अगर मेरे मार्ग पर आ जाए.. और ऐसा व्यक्ति सदा ही पूरा का पूरा आ जाता है। क्योंकि रहस्य खंड—खंड नहीं बनाता, तर्क खंड—खंड बनाता है।

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यह भी खयाल में ले लें कि तर्क एनालिटिक है; तर्क तोड़ता है, तर्क चल ही नहीं सकता तोड़े बिना। तर्क प्रिज्य की तरह है। जैसे कि काच के प्रिज्य में से हम सूरज की किरण निकालें, तो सात टुकड़ों में टूट जाती है। ऐसे ही तर्क के प्रिज्य से कुछ भी निकले, तो खंड—खंड हो जाता है। तर्क तोड़ता है, एनालिटिक है। श्रद्धा जोड़ती है, सिंथेटिक है। सब जुड़ जाता है, एक हो जाता है, जैसे किरणें प्रिज्म से वापस लौट गईं और एक हो गईं।

रहस्य टोटल है। विश्वास हमेशा पार्शियल है। आप कभी पूरा विश्वास नहीं कर सकते। लेकिन आप कभी अधूरे रहस्य में नहीं हो सकते। यह आपने कभी खयाल किया, आप यह नहीं कह सकते कि मैं थोड़ा— थोड़ा रहस्य अनुभव कर रहा हूं! रहस्य जब भी अनुभव होता है, तो पूरा अनुभव होता है। रहस्य कभी थोडा— थोड़ा अनुभव नहीं होता। मिस्ट्री कभी थोड़ी— थोड़ी अनुभव नहीं होती है, पूरी अनुभव होती है। या तो होती है अनुभव या नहीं होती। लेकिन जब भी होती है, तो पूरी अनुभव होती है।


विश्वास सदा थोड़ा— थोड़ा होता है, इसलिए हिस्सा मन का कटा रहता है। रहस्य का अनुभव मन को इकट्ठा कर देता है। इसलिए जितना सरल चित्त व्यक्ति हो, उतने रहस्य को अनुभव कर पाता है। छोटे बच्चे इसीलिए, उनकी आंखों में, उनके उठने—बैठने, उनके खेलने में परमात्मा की झलक कहीं—कहीं से दिखाई पड़ती है। क्योंकि सारा जीवन रहस्य है। तितलियां उड़ रही हैं, और उनके लिए हीरे—जवाहरात उड़ रहे हैं। पत्थर खिसक रहे हैं, और उनके लिए स्वर्ग का आनंद उतर रहा है। नदी बह रही है, और उनके लिए द्वार खुला है कुबेर के खजाने का। सब रहस्य है।

जेकब बोहमे ने कहा है कि जब मैं पहली दफे रहस्य के अनुभव को उपलब्ध हुआ, तब मैंने कहा कि मैं भी क्या पागल था! यह तो बचपन को ही फिर से पा लेना है। यह तो मैं फिर से बच्चा हो गया हूं।

जीसस से किसी ने पूछा कि कौन लोगतुम्हारे स्वर्ग के राज्य को पाने के अधिकारी होंगे? तो उन्होंने कहा, वे जो बच्चों की भांति फिर से हो जाएंगे। तो बच्चे श्रद्धालु होते हैं। बूढ़े ज्यादा से ज्यादा विश्वासी हो सकते हैं, बच्चे श्रद्धालु होते हैं।

कभी देखा है, बच्चे को बाप का हाथ पकड़े हुए? बाप का हाथ पकड़कर बच्चा चलता है। उसका हाथ बाप के हाथ को पकडे हुए, देखा है कभी! कितना ट्रस्ट, बाप के हाथ को छोटा—सा बच्चा पकड़े हुए, कितना भरोसा! बाप को खुद इतना भरोसा नहीं है कि हाथ को संभाल पाएगा कि नहीं संभाल पाएगा, रास्ते का पता है या नहीं है! उसको खुद भी पता नहीं है कुछ भी। लेकिन बेटा उसके हाथ को इतने ट्रस्ट…। श्रद्धा के लिए अगर अंग्रेजी में ठीक शब्द है, तो वह ट्रस्ट है—बिलीफ नहीं, फेथ नहीं—ट्रस्ट। बेटा हाथ पकडे हुए है, जैसे कि बाप परमात्मा है, सब उसे मालूम है।

एक बेटा आया है और अपनी मां की गोद में सिर रखकर सो गया है—ट्रस्ट! जैसे मां की गोद सारे दुखों के बाहर है, सारी चिंताओं के बाहर है। मां नहीं है बाहर चिंताओं के, मां नहीं है बाहर दुखों के, मां परेशानियों में हो सकती है। लेकिन जो छोटा—सा बेटा, दिनभर थका—मादा बाहर से खेलकर लौट आया है, वह मां की गोद में सिर रखकर सो गया निश्चित, उसे परमात्मा की गोद मिल गई—ट्रस्ट। मां को नहीं है, बेटे को है। और इसलिण्र बेटे के लिए मां की गोद परमात्मा का स्थान बन सकती है। खुद मां को नहीं है वह अनुभव। वह ट्रस्ट ने उस गोद को इतना शांत, और इतने आनंद से भर दिया है।

कृष्ण कहते हैं, जो इतनी श्रद्धा से, जैसे कि छोटा बेटा बाप का हाथ पकड़ ले और बेटा मां की गोद में सिर रखकर सो जाए और समझे कि अब दुनिया में कोई खतरा नहीं है, कोई इनसिक्योरिटी नहीं है, अब दुनिया में कोई मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता, अब बात खतम हो गई, अब वह निश्चित सो गया है, अब कोई चिंता नहीं है—इस भांति जो मेरी बात को मानकर चलता है, वह सब कर्मों से मुक्त हो जाता है।

लेकिन मेरी बात को मानकर चलता है। क्या कृष्ण का मतलब यह है कि जो किसी और की बात को मानकर चलता है, वह मुक्त नहीं होता? ऐसा मतलब लगाया जाता है, लगाएंगे ही। अनुयायी तो ऐसे अर्थ लगाएंगे ही। वे कहेंगे कि देखो, कृष्ण ने कहा है कि मेरी बात को मानकर जो चलता है, तो बाइबिल की बात मत मानना, नहीं तो भटक जाओगे; कुरान की बात मत मानना, नहीं तो भटक जाओगे। कृष्ण ने साफ कहा है कि जो मेरी बात मानकर चलता है श्रद्धापूर्वक, वह कर्मों के जाल से मुक्त हो जाता है। इतनी साफ बात और क्या? अब किसी और की मत मान लेना— महावीर की मत मानना, बुद्ध की मत मानना।

लेकिन यह बिलकुल गलत अर्थ है। कुक के भीतर से जो कह रहा है कि मेरी बात मानकर जो चलता है, वह पहुंच जाता है, वही बुद्ध के भीतर से कहता है कि मेरी बात मानकर जो चलता है, वह पहुंच जाता है। वही क्राइस्ट के भीतर से कहता है कि जो मेरी बात मानकर चलता है, वह पहुंच जाता है। वही मोहम्मद के भीतर से कहता है कि जो मेरी बात मानकर चलता है, वह पहुंच जाता है। वह जिस मैं की बात चल रही है, वह एक ही है। ये दरवाजे पच्चीस हैं, वह आवाज एक की है। इसलिए इस भ्रांति में मत पड़ना कि जो गीता की बात मानकर चलता है, वही पहुंच जाता है। कुरान की भी माने तो पहुंच जाएगा, बाइबिल की भी माने तो पहुंच जाएगा।

असली सवाल कुरान और बाइबिल का नहीं है, असली सवाल श्रद्धापूर्ण हृदय का है। इसमें एस्फेसिस में फर्क करना चाहता हूं। असली सवाल श्रद्धापूर्ण हृदय का है। अगर उतनी ही श्रद्धापूर्ण हृदय से कोई जीसस का हाथ पकड़ ले, तो वहा से भी पहुंच जाता है। कोई मोहम्मद का हाथ पकड़ ले, तो वहां से भी पहुंच जाता है। असली सवाल यह है कि श्रद्धापूण हृदय, अनासक्त कर्म करता हुआ कर्म के बाहर पहुंच जाता है। और मेरी बात, कृष्ण की बात नहीं है। मेरी बात, परमात्मा की बात है।

कृष्ण सिर्फ झरोखा हैं, जिससे परमात्मा झांका है अर्जुन के सामने। कभी वह मोहम्मद से झांकता है, कभी वह मूसा से झांकता है। हजार—हजार झरोखों से वह झांकता है। और जब भी झांकता है, तब उसकी आवाज इतनी ही आथेंटिक होती है। वह कहता है, मेरी बात मानोगे, तो पहुंच जाओगे। और इससे बड़ा विवाद दुनिया में पैदा होता है। क्योंकि कोई कहते हैं, यह मोहम्मद ने कहा, कोई कहते हैं, यह कृष्ण ने कहा; कोई कहते हैं, क्राइस्ट ने कहा। फिर इन तीनों में झगड़ा होता है कि किसकी मानें! वे कहते हैं कि हमारे गुरु ने कहा है, मेरी। जीसस ने कहा है, मैं हूं मार्ग, मैं हूं द्वार, जो मुझ पर चलेगा वह पहुंच जाएगा। आई एम दि वे। आई एम दि टथ, मैं हूं सत्य। मैं हूं द्वार। आओ, मुझ पर चलोगे, तो पहुंच जाओगे। अब वह जीसस का मानने वाला जरूर कहेगा ईसाई कि इतना साफ कहा है, और तुम कहा भटक रहे हो? राम को मानोगे, कृष्ण को मानोगे, बुद्ध को मानोगे, भटक जाओगे, नर्क में पड़ोगे।

लेकिन बड़ी भूल हो गई है। पूरी मनुष्यता से भूल हो गई है। यह जो भीतर से कह रहा है, आई एम दि वे, यह वही है, जो कृष्ण से कह रहा है, अर्जुन, मेरी बात मान, तो कर्म से मुक्त हो जाएगा। यह एक ही जीवन— धारा का अनेक — अनेक झरोखों से झांकना है।

समझें, ऐसा समझें कि गंगा के पास गए और गंगा ने कहा, मेरा पानी पीयोगे, तो प्यास से मुक्त हो जाओगे। फिर वोलग़ के किनारे गए और वोलत ने कहा, मेरा पानी पीयोगे, तो प्यास से मुक्त हो जाओगे। तुमने कहा कि यह तो बड़ा कंट्राडिक्टरी मामला है। गंगा भी यही कहती है, वोलग़ भी यही कहती है; हम किसकी मानें? हम तो गंगा को मानने वाले हैं, हम वोलग़ का पानी न पीएंगे। हम तो गंगा का ही पानी पीएंगे। तो आप पागल हैं। गंगा से जिस पानी ने कहा था कि मुझे पीयोगे, तो प्यास से मुक्त हो जाओगे, वही पानी वोल्गा से कह रहा है कि मुझे पीयोगे, तो प्यास से मुक्त हो जाओगे। गंगा और वोलग़ का फर्क पानी का फर्क नहीं है। गंग्र और वोलग़ का फर्क सिर्फ तटों का फर्क है, पानी का फर्क नहीं है। कृष्ण के तट अलग हैं, बुद्ध के तट अलग हैं। लेकिन जो जल की धार उनसे बहती है, वह एक ही परमात्मा की है। इसे स्मरण रखेंगे, तो यह बात ठीक से खयाल में आ सकती है।

प्रश्न :

भगवान श्री, आखिरी का श्लोक है, उसका अर्थ है, सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात अपने स्वभाव से परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है, फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा! इसका अर्थ भी स्पष्ट करें।

कृष्‍ण अर्जुन को समझा रहे हैं समर्पण के लिए, सरेंडर के लिए। वही मूल सूत्र है, जहा से व्यक्ति अपने को छोड़ता और परमात्मा को पाता है। तो वे उस समर्पण के लिए कह रहे हैं कि प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के गुणों के परवश कर्म करता है, ज्ञानी भी, अज्ञानी भी। और किसी का हठ इसमें कुछ भी नहीं कर सकता है। जैसे, अज्ञानी भी मरता है, ज्ञानी भी मरता है और किसी का हठ इसमें कुछ भी नहीं कर सकता है। क्योंकि शरीर का गुणधर्म है कि जो पैदा हुआ, वह मरेगा। असल में जिस दिन पैदा हुआ, उसी दिन मरना शुरू हो गया है। जिसका एक छोर है, उसका दूसरा छोर भी है। इधर जन्म एक छोर है, मृत्यु दूसरा छोर है। शानी भी मरता है, अज्ञानी भी मरता है। और अगर कोई हठ करे कि मैं न मरूंगा, तो वह पागल है। हठ से कुछ भी न होगा। लेकिन एक सवाल उठ सकता है कि अगर इतनी भी मरता है, अज्ञानी भी मरता है; और अगर ज्ञानी भी परवश होकर जीता है और अज्ञानी भी परवश होकर जीता है, तो फिर दोनों में फर्क क्या है?

फर्क है, और बड़ा फर्क है। अज्ञानी हठपूर्वक प्रकृति के गुणों से लड़ता हुआ जीता है। हारता है, पर लड़ता जरूर है। ज्ञानी जानकर कि प्रकृति के गुण काम करते हैं, लड़ता नहीं, इसलिए हारता भी नहीं, और साक्षीभाव से जीता है। मृत्यु दोनों की होती है, ज्ञानी की भी, अज्ञानी की भी। अज्ञानी कोशिश करते हुए मरता है कि मैं न मरूं, ज्ञानी बांहें फैलाकर आलिंगन करता हुआ मरता है कि मृत्यु स्वाभाविक है। इसलिए अज्ञानी मरने की पीड़ा भोगता है, ज्ञानी मरने की कोई पीड़ा नहीं भोगता। अज्ञानी मरने से भयभीत, कांपता हुआ मरता है, ज्ञानी आनंद से पुलकित, नए द्वार से नए जीवन में प्रवेश करता है। दोनों मरते हैं।

प्रकृति के क्रम के अनुसार, प्रकृति के गुण के अनुसार दोनों के जीवन में सब कुछ वही घटता है। अज्ञानी भी जवान होता है प्रकृति के गुणों से, ज्ञानी भी जवान होता है। अज्ञानी समझ लेता है कि मैं जवान हूं और ज्ञानी समझता है कि जवानी एक फेज है, यात्रा का एक पड़ाव है, आया और गया। फिर अज्ञानी जवानी छूटती है, तो दुखी होता, पीड़ित होता, परेशान होता। ज्ञानी—छूटती है, तो जैसे सांझ सूरज डूब जाता है, ऐसी जवानी डूब जाती है, वह आगे बढ़ जाता है।

ज्ञानी और अज्ञानी में जो फर्क है, वह इतना ही है कि अज्ञानी जो होने ही वाला है, उससे भी व्यर्थ लडकर परेशान होता है। ज्ञानी जो होने ही वाला है, उसे सहज स्वीकार करके परेशान नहीं होता है। प्रकृति के गुण दोनों पर एक—सा काम करते हैं, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता.। प्रकृति ज्ञानी और अज्ञानी को नहीं देखती, प्रकृति का अपना कर्म है, अपनी व्यवस्था है, अपने गुणधर्मों की यात्रा है। प्रकृति वैसी ही चलती रहती है। वह कभी नहीं देखती, देखने का कोई सवाल भी नहीं है।

कृण यह कह रहे हैं, इसलिए हठधर्मी व्यर्थ है। क्यों वे अर्जुन से कह रहे हैं? अर्जुन थोड़ी हठधर्मी पर उतारू है। वह कहता है कि मैं यह क्षत्रिय—वत्रिय होना छोड़कर भागता हूं। मैं युद्ध बंद, करता हूं। यह मैं नहीं करूंगा। वह कहता है कि मैं लोगों को नहीं मारूंगा। कृष्ण यह कह रहे हैं कि मरना जिसे है, वह मरता है; तू नाहक हठधर्मी करता है कि तू नहीं मारेगा, या तू मारेगा; ये दोनों ही हठधर्मियां हैं। जो मरता है, वह मरता है; जो नहीं मरता, वह नहीं मरता है।

कृष्ण का गणित बहुत साफ है। वे यह कह रहे हैं कि तू इसमें व्यर्थ हठधर्मी न कर। तू सिर्फ एक पात्र हो जा इस अभिनय का और जो परमात्मा से तेरे ऊपर गिरता है, उसे होने दे। और जो प्रकृति से होता है, उसे होने दे। तू इसमें बीच में मत आ, तू अपने को मत ला। ज्ञानी और अज्ञानी में उतना ही फर्क है। घटनाएं वही घटती हैं, रुख अलग हो जाता है; कोण देखने का अलग हो जाता है। बीमारी आ जाती है, तो अज्ञानी छाती पीटकर रोता है कि बीमारी आ गई। ज्ञानी स्वीकार कर लेता है कि बीमारी आ गई। शरीर का धर्म है कि वह बीमार होगा, नहीं तो मरेगा कैसे! नहीं तो वृद्ध कैसे होगा! शरीर एक बड़ा संस्थान है, एक संघात है, उसमें करोडों जीवाणुओं का जोड़ है। उतनी बड़ी मशीनरी चलेगी, खराब भी होगी, ओवर ऑयलिंग की भी जरूरत होगी; रिपेयरिंग भी होगी; वह सब होगा। इतनी बड़ी मशीन अभी पृथ्वी पर दूसरी कोई नहीं है, जितनी आदमी के पास है। इतनी कांप्लेक्स, इतनी जटिल मशीन भी कोई नहीं है, जितनी अभी आदमी है। आप कोई छोटी—मोटी घटना नहीं हैं। वह तो आपको कुछ करना नहीं पड़ता, इसलिए आपको कुछ पता नहीं चलता कि कितनी बड़ी मशीन काम कर रही है चौबीस घंटे, अहर्निश। मां के पेट में जिस दिन पहले दिन गर्भाधान हुआ था, उस दिन से काम शुरू हुआ; और जब तक लोग चिता पर न चढ़ा देंगे, तब तक जारी रहेगा। चिता पर इसलिए कह रहा हूं कि जिनको हम कब्र में गड़ाते हैं, तो गड़ाने के बाद भी बहुत दिन तक काम जारी रहता है मशीन का। आत्मा तो जा चुकी होती है। मुर्दों के भी नाखून बढ़ जाते हैं, बाल बढ जाते हैं कब्र में। मशीन काम ही करती रहती है, मोमेंटम पकड जाती है।


जैसे कि कोई साइकिल चलाता है, तो घर आने के दस—बीस कदम पहले ही पैडल मारना बंद कर देता है, फिर भी साइकिल चली ही जाती है। यात्री उछलकर उतर भी जाए नीचे, तो साइकिल अकेली ही दस—बीस कदम चली जाती है। मोमेंटम, पुरानी चलने की गति पकड़ जाती है। मुरदे कब्र में अपने नाखून बढ़ा लेते हैं, बाल बढ़ा लेते हैं, वह मशीन काम करती चली जाती है। उन्हें पता ही नहीं लगता एकदम से मशीन को कि मालिक जा चुका है, पता लगते—लगते ही पता लगता है। इसलिए मैंने कहा, चिता तक। जब तक कि हम जला ही नहीं देते, मशीन काम करती चली जाती है, अहर्निश। बहुत आटोमेटिक है, स्वचालित है। फिर उसके अपने गुणधर्म हैं, वे आते रहेंगे।

अज्ञानी हर चीज से परेशान होता है, यह क्यों हो गया? और कभी—कभी तो ऐसा होता है कि न हो, तो भी परेशान होता है कि ऐसा क्यों नहीं हुआ? हो गया, तब तो ठीक ही है; नहीं हुआ, तो भी परेशान होता है।

एक मेरे मित्र हैं। उनको दमा का दौर पड़ता है, तो परेशान होते हैं। और किसी दिन नहीं पड़ता, तो भी परेशान होते हैं। वे मुझसे कहते हैं कि आज दौर नहीं पड़ा, क्या बात है? उन्हें इससे भी घबड़ाहट लगती है। यह भी एक जीवन का क्रम हो गया उनके कि दौर पड़ना चाहिए। न पड़े, तो भी बेचैनी होती है कि कुछ गड़बड़ है।

दुख आता है, तो परेशानी होती है, नहीं आता है, तो परेशानी होती है। सुख आता है, तो परेशानी होती है; नहीं आता है, तो परेशानी होती है। अज्ञानी हर चीज को परेशानी बनाने की कला जानता है, हठधर्मी जानता है। हठधर्मी कला है जिंदगी को परेशानी बनाने की। अगर जिंदगी को परेशानी बनाना है, तो हर चीज में हठ किए चले जाइए; जब जो हो, उसके खिलाफ लडिए; और जब जो न हो, उसके खिलाफ भी लडिए। और फिर आपकी पूरी जिंदगी एक संताप, एक एंग्विश, एक नर्क बन जाएगी; बन ही गई है।

कृष्ण कह रहे हैं, इस हठधर्मी में कुछ भी सार नहीं है अर्जुन, जान कि जो होता है, होता है। जो होता है, होता है—ऐसा जान।!

जीसस को जिस रात पकड़ा गया और लोग उन्हें सूली पर चढ़ाने के लिए ले जाने लगे। तो जीसस को सांझ कुछ लोगों ने खबर दी थी। खबर दी थी कि आप पकड़े जाएंगे, रात खतरा है, भाग जाएं। तो जीसस ने कहा, जो होने वाला है, होगा। फिर वे वहीं गैथस्मेन के बगीचे में रुके रहे। फिर भी रात मित्रों ने कहा, अभी भी कुछ देर नहीं हुई, अभी भी हम निकल सकते हैं। लेकिन जीसस ने कहा, जो होने ही वाला है, उससे कब कौन निकल पाया है! फिर दुश्मनों की आवाज सुनाई पड़ने लगी, मशालें दिखाई पड़ने लगीं कि लोग उन्हें खोज रहे हैं। लोगों ने, शिष्यों ने, मित्रों ने कहा, देखते हैं, मशालें अंधेरे में दिखाई पड़ती हैं। मालूम होता है, वे आते हैं। तो जीसस ने ः कहा, अगर उन्हें पहुंचना ही है, तो रास्ता जरूर उन्हें मिल जाएगा।


अब यह, यह शानी का लक्षण है।

साक्रेटीज को जहर दिया जा रहा है। अदालत ने साक्रेटीज से कहा कि तुम एथेंस छोड्कर चले जाओ, तो हम तुम्हें मुक्त कर सकते हैं, जहर नहीं देंगे। साक्रेटीज से कहा कि अगर तुम एथेंस में भी रहो और सत्य बोलना बंद कर दो, तो हम तुम्हें मुक्त कर दें और जहर न दें। साक्रेटीज ने कहा, मैं कुछ भी नहीं कह सकता। सत्य बोला जाना होगा, तो बोला जाएगा; और नहीं बोला जाना होगा, तो नहीं बोला जाएगा। मैं वायदा कल के लिए कैसे करूं न: मुझे पक्का नहीं कि कल होगा भी कि नहीं होगा! तो मैं कैसे प्रामिस कर सकता हूं? मैं वायदा कैसे कर सकता हूं? तुम अपने जहर का इंतजाम कर लो। मैं कोई वायदा नहीं कर सकता। कल का क्या पता, क्या होगा? जो होगा, मैं राजी हूं।

फिर मित्रों ने कहा कि यह तो बड़ी गलत बात है। हम रिश्वतखोरी करके और आपको जेल से निकाले ले जाते हैं रात में। साक्रेटीज ने कहा, मैं राजी हूं। लेकिन तुमसे मैं यह पूछता हूं कि अगर मेरी मौत कल आएगी, तो उसके बाहर तुम निकाल पाओगे कि नहीं? उन मित्रों ने कहा, मौत के बाहर हम कैसे निकाल पाएंगे! तो साक्रेटीज ने कहा, फिर क्यों परेशान होते हो? इतनी परेशानी भी क्या! अगर मरना ही है, और मरना है ही, दिन दो दिन से क्या फर्क पड़ेगा लेकिन दो दिन के लिए मुझे चोर क्यों बनाते हो! नाहक की हठधर्मी क्यों? ठीक है, मौत आती है, तो आ जाए।

फिर जहर पीस रहा है जो आदमी साक्रेटीज को देने के लिए। छह बजे जहर देना है, लेकिन सवा छह बज गया, तो साक्रेटीज खुद उठकर बाहर आया और उससे पूछा, बड़ी देर कर रहे हो! उसने कहा, तुम पागल तो नहीं हो! मैं तो तुम्हारी वजह से ही देर कर रहा हूं कि थोड़ी देर और जी लो। साक्रेटीज ने कहा कि पागल हो, कितनी देर जिला पाओगे! जब मौत आनी ही है, तो ठीक है, सूरज के रहते आ जाए, तो जरा मैं भी देख लूं कि मौत कैसी होती है। तू अंधेरा किए दे रहा है। यह गैर—हठधर्मी का व्यक्तित्व ही ज्ञान का व्यक्तित्व है।

तो कृष्ण कह रहे हैं, तू हठधर्मी मत कर। उतनी ही बात कह रहे हैं। और हठधर्मी कर, तो समर्पण न कर सकेगा। और हठधर्मी न कर, तो समर्पण कर सकता है। समर्पण वही कर सकता है, जो हठधर्मी नहीं करता है। वह आदमी समर्पण कभी नहीं कर सकता है, जो हठधर्मी करता है।

प्रश्न :

भगवान श्री, एक मित्र पूछते हैं, कृष्ण जिस श्रद्धा की बात करते हैं, वह श्रद्धा अंधश्रद्धा भी हो सकती है। कृष्ण ने विवेक शब्द का उपयोग क्यों नहीं किया, जो श्रद्धा से कहीं ज्यादा सार्थक शब्द है?। कृपया इसे स्पष्ट करें।

श्रद्धा कभी भी अंधश्रद्धा नहीं हो सकती, सिर्फ विश्वास ही अंधविश्वास हो सकता है। सच तो यह है कि विश्वास अंधविश्वास होता ही है। श्रद्धा कभी अंधी नहीं हो सकती है। नहीं हो सकने का कारण है। नहीं हो सकने का कारण है। कारण यह है कि श्रद्धा मनुष्य के समग्र व्यक्तित्व की एकता है, पूर्ण व्यक्तित्व की एकता है। जैसा मैंने कहा, इंटिग्रेटेड माइंड का नाम श्रद्धा है; एकजुट हुए मन का नाम श्रद्धा है। और अगर इकट्ठा मन ही आपका अंधा है, तो फिर आपकी आख का कोई उपाय नहीं, क्योंकि कोई जगह और बची नहीं। श्रद्धा का अर्थ है, पूरा, आप में जो भी चेतना है, वह पूरी है। तो अगर पूरी चेतना भी आख न बने, तो फिर और क्या आख बन सकेगा!

जितनी चेतना इकट्ठी होती है, उतनी आख बन जाती है। चेतना जितनी इकट्ठी, योगस्थ होती है, उतनी देखने वाली, दर्शन के योग्य हो जाती है। इसलिए हमने सत्य के अनुभव को दर्शन कहा। क्योंकि जब चेतना पूरी जागकर एक हो जाती है, तो पूरी आख बन जाती है और देखती है सत्य को। इसलिए हमने सत्य के साक्षात्कार की बात कही है, दिखाई पड़ता है।

श्रद्धा कभी भी अंधी नहीं हो सकती। और अगर अंधी हो, तो जानना कि वह विश्वास है। वही मैं फर्क कर रहा हूं। विश्वास अंधा होता है, अविश्वास भी अंधा होता है। आमतौर से लोग समझते हैं, विश्वास अंधा होता है। हम कहते हैं, ब्लाइंड बिलीफ, लेकिन ब्लाइंड डिसबिलीफ जैसा शब्द हम आमतौर से उपयोग नहीं करते। हम कहते हैं, अंधा विश्वास, लेकिन अंधा अविश्वास! कभी खयाल किया आपने? अंधा अविश्वास भी होता है।

एक नास्तिक कहता है, मैं ईश्वर को नहीं मानता। यह आख वाला अविश्वास है? इस नास्तिक ने ईश्वर को जाना है? खोजा है? सब जगह देख ली है, जहां-जहां हो सकता था, फिर कह रहा है कि नहीं है? नहीं, यह कह रहा है कि नहीं, यह बात नहीं है। चूंकि आप ईश्वर को सिद्ध नहीं कर पाते, इसलिए हम कहते हैं कि नहीं है। कोई सिद्ध न कर पाए, तो भी सिद्ध नहीं होता कि नहीं है। इतना ही सिद्ध होता है कि है, यह सिद्ध नहीं हो पा रहा है। अविश्वास भी अंधा होता है, विश्वास भी अंधा होता है। लेकिन जो व्यक्ति न विश्वास में होता, न अविश्वास में होता, उसको पहली बार आख मिलती है।

लेकिन खयाल में मुझे आया कि आप क्या चाहते हैं। आपने कहा, विवेक शब्द और ऊपर है।

नहीं, बहुत ऊपर नहीं है। विवेक और श्रद्धा में कुछ बुनियादी अंतर है। वह मैं आपको खयाल दिला दूं।

विवेक व्यक्ति की घटना है-आपकी। आप ही सोच- विचारकर, खोज-बीनकर जो तय कर लेते हैं, वह विवेक है। आप ही। लेकिन श्रद्धा आपकी घटना नहीं है। आप खोज-बीनकर, सोच-विचारकर भी पाते हैं कि नहीं पाया जाता और अपने को परमात्मा में छोड़ देते हैं, तब आप और परमात्मा संयुका होकर जो अनुभव घटित होता है, वह श्रद्धा है। विवेक व्यक्ति निर्भर है, श्रद्धा समष्टि निर्भर है। विवेक बूंद का है, श्रद्धा सागर की है। बूंद जब तक अपने बलबूते जीती है, तब तक विवेक है। ठीक जीए तो विवेक और गलत जीए तो अविवेक। लेकिन बूंद जब जीती ही नहीं अपनी तरफ से, सागर में अपने को छोड़ देती है और कहती है, सागर का जीवन ही अब मेरा जीवन है, तब श्रद्धा है।

श्रद्धा बहुत विराट है। विवेक बहुत सीमित है। आपकी सीमा विवेक की सीमा है, आपकी सीमा श्रद्धा की सीमा नहीं है। इसलिए श्रद्धा असीम है और विवेक सीमित है। विवेक फाइनाइट है और श्रद्धा इनफाइनाइट है। विवेक में आप ही हैं, भूल-चूक हो सकती है। क्योंकि आप सर्वज्ञ नहीं हैं, इसलिए विवेक में सदा गलती हो सकती है। श्रद्धा में गलती का कोई उपाय ही नहीं है, क्योंकि आपने परमात्मा पर ही छोड़ दिया। और अगर परमात्मा से ही गलती होती है, तो फिर अब गलती से बचने की कोई जरूरत भी नहीं है, कोई कारण भी नहीं है। फिर बचिका भी कैसे?

विवेक भटक सकता है, श्रद्धा कभी नही भटकती। विवेक चूक सकता है, श्रद्धा अचूक है। क्योंकि विवेक आपका ही है आखिर, श्रद्धा सिर्फ आपकी नहीं है। श्रद्धा का मतलब ही है कि अपने से अब न होगा; अपने हाथ नहीं पहुंच पाते उतनी दूर, जहां सत्य है; अपनी छलांग नहीं लग पाती उस खाई में, जहा परमात्मा है; अपने से न होगा। जिस क्षण इस हेल्पलेस, इस असहाय स्थिति का अनुभव होता है कि हमारी सीमा है, हमसे न होगा, उसी क्षण श्रद्धा जगती है। तब हम कहते हैं, अब तू ही कर, अब मुझसे तो नहीं होता; अब मैं नहीं चल पाता, अब तू ही चला; अब मेरे हाथ काम नहीं करते, अब तू ही हाथ पकड़; अब मेरे पैर नहीं उठते, अब तू ही उठा तो उठा। जिस क्षण व्यक्ति का थक जाता है सब, उसी क्षण उसी थकान से आविर्भाव होता है उस श्रद्धा का, जो विराट से एक कर देती है।

विवेक बहुत बड़ा शब्द नहीं है। और ध्यान रहे, विवेक में बहुत गहरे विचार छिपा है। वह, कहें कि विचार का सार अंश है, कहें कि बहुत विचार का निचोड़ है, कहें कि जैसे बहुत फूलों को निचोड़कर कोई इत्र बना ले, ऐसा बहुत विचारों को निचोड़कर कोई इत्र बना ले, तो उसका नाम विवेक है। लेकिन श्रद्धा निर्विचार है। वह किसी विचार का इत्र नहीं है। वह किन्हीं फूलों का इत्र नहीं है। वह हमारा अनुभव ही नहीं है। हमारे अनुभव की असमर्थता है।

इसलिए श्रद्धा बहुत बड़ा शब्द है। ‘

पर यह मै जरूर कहूंगा कि श्रद्धा तक वे ही पहुंचते हैं, जो। विवेकवान हैं; वे नहीं पहुंचते, जो विवेकहीन हैं। इतना कहूंगा और इतना ही उपयोग है विवेक का। विवेकहीन श्रद्धा तक कभी नहीं पहुंचते। विवेकहीन अश्रद्धा तक पहुंच जाते हैं। विवेकवान श्रद्धा तक पहुंच जाते हैं। क्या मतलब मेरा? विवेकहीन अश्रद्धा तक पहुंच जाते हैं। मैंने अभी आपको कहा कि श्रद्धा का मैं अर्थ करता हूं? ट्रस्ट, भरोसा। भरोसा-सहज, सरल। अश्रद्धा का अर्थ करता हूं र गैर- भरोसा-कठिन, जटिल-किसी का भी नहीं; परमात्मा तो दूर है, किसी का भो नहीं, भरोसा ही नहीं। अंततः अपना भरोसा भी नहीं।

एक आदमी को मैं जानता हूं, मेरे गांव में मेरे घर के सामने रहते थे। ताला लगाते हैं, दस कदम फिर लौटकर आकर ताला हिलाकर देखते हैं। फिर जाते हैं, फिर देखते हैं कि किसी ने देखा तो नहीं एक दफे लौटा हुआ! फिर लौटते हैं, फिर हिलाकर देखते हैं। एक। दिन मैं छत पर बैठा देख रहा था। दो बार मैंने देखा, मैंने सोचा, तीसरी बार भी यह आदमी जरूर लौटेगा। क्योंकि जब दो बार में भरोसा नहीं आया कि ताला लगा है कि नहीं, तो तीसरी बार में कैसे आएगा! लेकिन उस आदमी ने भी मुझे देख लिया। तो ठीक जगह, जहा से वह लौटता था, उस जगह जाकर उसके पैर थोड़े-से डगमगाए। मैंने कहा, लौट आओ। उसने कहा कि मैं आपके ही डर से तो लौट नहीं रहा। तो मैंने कहा कि यहा मेरे पास आओ। बात क्या है? उसने कहा, मुझे भरोसा ही नहीं होता। ऐसा लगता है कि पता नहीं भूल-चूक से खुला ही न रह गया हो! और पता नहीं कि मैंने हिलाकर देखा भी है या नहीं देखा!

अब वह आदमी इतनी दफे देख चुका है हिलाकर कि शक हो जाना बिलकुल स्वाभाविक है। अब यह जो आदमी है, यह अश्रद्धा को उपलब्ध हुआ। यह अश्रद्धा टोटल हो गई। यह पत्नी पर भरोसा नहीं कर सकता, बेटे पर भरोसा नहीं कर सकता, मित्र पर भरोसा नहीं कर सकता। यह अपने ही हाथों पर भरोसा नहीं कर सकता। यह अपनी ही बुद्धि पर भरोसा नहीं कर सकता। इसका सब भरोसा खो गया। अब ऐसा अश्रद्धावान जीते जी मर गया। पर यह इतनी अश्रद्धा कैसे आई होगी? यह अविवेक के कारण आई है। अविवेक का क्या मतलब? अविवेक का मतलब, विवेक का गलत उपयोग किया है इसने।

अगर आपको एक आदमी ने धोखा दे दिया, तो आप समझते हैं कि अब किसी आदमी पर भरोसा नहीं करना; यह अविवेक है। सच तो यह है कि जिस आदमी ने आज आपको धोखा दिया, वह भी कल धोखा देगा, यह जरूरी नहीं है। आदमी बदल जाते हैं। और आपको एक आदमी ने धोखा दिया और सारी मनुष्यता पर से आपका विश्वास उठ गया! बड़ी अविवेक की बात है। बड़ी विवेकहीन बात है। एक जगह ठोकर लग गई, तब सारी दुनिया में। ठोकर लगेगी, यह निर्णय’ ले लिया!

एक दिन ऐसा हुआ कि मैं एक ट्रेन में सवार था। एक स्टेशन पर रुकी बहुत देर तक एक आदमी भीख मताने खिड़की पर आया और उसने कहा कि मैं बड़ी मुसीबत में हूं। मैंने कहा, तुम मुसीबत मत बताओ, क्योंकि मुसीबत बताने में तुम्हारा भी समय जाया होगा, मेरा भी। तुम मुझे यह कहो कि मैं क्या कर सकता हूं? उसने मेरी तरफ देखा, उसको शक हुआ, क्योंकि बिना मुसीबत बताए किसी को फंसाया नहीं जा सकता। क्योंकि जब वह पूरी मुसीबत बता ले और पाच मिनट आप सुन लें, तो फिर इनकार करने में कठिनाई हो जाती है। तो उसने कहा कि नहीं, मेरी मुसीबत……।

मैंने कहा कि तुम मुसीबत की बात ही मत करो। तुम मुझे यह कहो कि क्या कर सकता हूं? उसने बड़ी हिम्मत जुटाकर कहा कि एक रुपया दे दें। मैंने कहा, तुम एक रुपया लो। इतनी सरलता से छूटती है बात! तुम नाहक मुसीबत मुझे बताओ, मैं तुम्हारी मुसीबत सुनूं। तुम यह रुपया लो और जाओ। वह आदमी बड़ी बेचैनी में गया। उसने बार-बार रुपए को देखा भी होगा, फिर लौटकर मुझे भी देखा कि यह आदमी भरोसे का नहीं मालूम पड़ता। क्या गड़बड़ है! कुछ मैंने कहा ही नहीं, कोई मुसीबत नहीं सुनी। होता तो ऐसा है कि मुसीबत पूरी बताओ, तब भी कोई कुछ नहीं देता। और उसने सोचा कि यह आदमी…!

पांच सात मिनट बाद वह वापस आया। टोपी लगाए था, वह उतारकर रख आया। उसने आकर फिर खिड़की पर कहा कि मैं बड़ी मुसीबत में हूं। मैंने कहा, मुसीबत की बात ही मत करो। तुम मुझे यह बताओ कि तुम्हें मैं क्या कर सकता हूं? उसने मुझे पूरी आख से देखा कि मैं पागल तो नहीं हूं! उसने बड़ी हिम्मत जुटाई, उसने। सोचा कि ऐसा नहीं हो सकता कि यह आदमी भूल ही गया हो, सिर्फ टोपी अलग कर लेने से। और वही की वही बात। उसने बहुत हिम्मत जुटाकर कहा कि मुझे दो रुपए…! मैंने कहा, तुम यह दो। रुपए लो। वह फिर मुझे बार-बार लौटता हुआ देखे, रुपए देखे।

दो-तीन मिनट बाद वह फिर आ गया। कोट पहने था, उसको भी उतार आया। खिड़की पर आया। मैंने उससे पहले ही कहा कि तू शुरू ही मत कर कि तू मुसीबत बता। उसने कहा, आप आदमी कैसे हो? मैं वही आदमी हूं, आपको समझ नहीं आ रहा है! मैंने कहा, मैं तो यह समझ रहा हूं कि तुम नहीं समझ रहे हो कि मैं वही आदमी हूं। मैं तो इस खयाल में हूं। वह मेरे तीन रुपए वापस लौटाने लगा। उसने कहा कि रुपए रख लो आप। रुपए मैं नहीं लूंगा। रुपए तुम ले जाओ। रुपए तुमने कमाए हैं, तुमने मेहनत पूरी की है। वह रुपए रखकर छोड़ गया दरवाजे पर। उसने कहा, रुपए मैं नहीं लूंगा। मैंने कहा, बात क्या है? रुपए क्यों नहीं लेते? उसने कहा कि जिस आदमी ने मुझ पर इतना भरोसा किया, उसे मैं इस तरह धोखा नहीं दे सकता हूं।

एक आदमी धोखा दे जाए, सारी दुनिया ने धोखा दे दिया हमें। अब हम सबसे सम्हले हुए बैठे हैं। हालांकि बचाने को पास में कुछ भी नहीं है। सम्हले हुए बैठे हैं!

अविवेक अश्रद्धा पर ले जाता है। धीरे— धीरे सब तरफ अश्रद्धा हो जाती है। विवेक श्रद्धा पर ले जाता है। और धीरे— धीरे सब तरफ श्रद्धा हो जाती है। अविवेक वहां पहुंचा देता है, जहां सिवाय धोखे के और कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। और विवेक वहा पहुंचा देता है, जहां सिवाय भरोसे के और कुछ दिखाई नहीं पडता है।

तो मैं समझता हूं कि विवेक का मूल्य है, बट एज ए मीन्स, एक साधन की तरह। श्रद्धा तक पहुंचा दे, यही उसका मूल्य है। लेकिन विवेक श्रद्धा से बड़ा शब्द नहीं है। श्रद्धा बड़ी गहरी अनुभूति है। इस जगत में इससे बड़ा कोई आनंद नहीं है कि मुझे समग्र भरोसा आ जाए कि सब परमात्मा है। इस जगत में इससे बड़ी कोई निश्चितता नहीं है कि मुझे स्मरण आ जाए कि सब तरफ मैं ही हूं। इस जगत में इससे बड़ी कोई अनुभूति नहीं है कि सब हाथ मेरे, सब आंखें मेरी, सब पैर मेरे। ऐसी प्रतीति का नाम श्रद्धा है। जिस दिन कोई पराया दिखाई ही नहीं पड़ता है कहीं, उसी दिन परमात्मा दिखाई पड़ता है। उसी को हम समर्पण कह सकते हैं।

कृष्ण समर्पण की ही बात समझा रहे हैं। विवेक समर्पण तक ले जाए, तो काफी है। लेकिन विवेक स्वयं समर्पण नहीं बनता। विवेक सिर्फ बता सकता है कि तुम असमर्थ हो अपने में। बस, इतना निगेटिव काम कर सकता है कि वह कह दे कि तुम न पा सकोगे सत्य को। बस इतना। इतना भी पता चल जाए, तो विवेक ने काम पूरा कर दिया। अब आप छलांग लगा सकते हैं, वहा, जहां परम श्रद्धा है।

और श्रद्धा की अपनी आंख है। लेकिन वह आंख तर्क जैसी नहीं है, वह आंख प्रेम जैसी है। वह आंख चीर—फाड करने वाली नहीं है, वह आंख छेद देने वाली नहीं है। आंखों में भी फर्क होता है। जब कभी कोई आपको प्रेम से देखता है, तो आंख और होती है। वह आपको चीरती—फाड़ती नहीं, सर्जरी नहीं करती है वह आंख। आपके भीतर कहीं घाव हों, तो उनको जोड़ देती है और मलहम कर जाती है। कभी प्रेम की आंख फाड़ती नहीं, काटती नहीं, विश्लेषण नहीं करती। प्रेम की आंख आपको जोड़ जाती है, फांकों को इकट्ठा कर जाती है। आपके भीतर घाव हों, तो पूर जाती है! प्रेम की आंख आपको इंटिग्रेट कर जाती है। लेकिन घृणा की आंख? घृणा की आंख आपको टुकड़े—टुकड़े कर जाती है, छार—छार काट देती है।

हमारे पास एक शब्द है, लुच्चा। लुच्चा हम कहते हैं बुरे आदमी को। आपने कभी सोचा कि लुच्चा का मतलब क्या होता है? लुच्चा संस्कृत के लोचन शब्द से बना है, आंख से। जिसकी आंख चीर—फाड़ कर देती है किसी के भीतर जाकर, वह लुच्चा। लुच्चा का मतलब होता है, इस तरह देखने वाला आदमी कि उसकी आंख भीतर छुरी की तरह प्रवेश कर जाती है। उसकी आंख छुरी की तरह काम करती है। तो लुच्चे को पहचानने का और कोई रास्ता नहीं है, सिवाय आंख के, आंख से। हम क्रिटिक को आलोचक कहते हैं। वह भी आंख से बनता है। आलोचक, वह भी लोचन से ही बनता है। आलोचक उसे कहते हैं, जो बड़ी खोज—बीन करके देखता है कि कहां क्या है।

आंखें बहुत तरह की हैं। तर्क की भी अपनी आंख है, उसी से वितान का जन्म होता है। श्रद्धा की अपनी आंख है, उसी से धर्म का जन्म होता है। श्रद्धा तर्क की नजरों में अंधी हो सकती है। श्रद्धा की नजरों में तर्क बिलकुल विक्षिप्त है, अंधा ही नहीं, पागल भी। लेकिन वह बड़े अलग कोणों पर खड़े होकर जीवन को देखना है। ही, जिसने तर्क से ही दुनिया को देखा, वह कहेगा, श्रद्धा अंधी होती है। लेकिन जिसने श्रद्धा के और ऊंचे पर्वत शिखर से देखा, वह कहेगा, तर्क विक्षिप्त है।

और ध्यान रहे, श्रद्धा तक कोई भी नहीं पहुंचता, जो तर्क से न गुजरा हो। और जो श्रद्धा पर पहुंच जाए, वह कभी तर्क पर नहीं पहुंचता। इसलिए श्रद्धा वाले को तर्क और श्रद्धा दोनों का अनुभव होता है, तर्क वाले को सिर्फ तर्क का अनुभव होता है। और जिसको एक का अनुभव हो, उसकी बात बहुत भरोसे की नहीं होती।

जिसको दोनों का अनुभव है, उसकी बात ही भरोसे की होती है।

प्रश्न :

भगवान श्री, अगले श्लोक में जाने के पहले एक छोटा—सा प्रश्न और। श्लोक क्रमांक तीस में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अध्यात्म चेतसा होकर संपूर्ण कर्मो को मुझे समर्पित करके तू युद्ध कर। कृपया अध्यात्म चेतसा होकर, इसका अर्थ पुन: स्पष्ट करें।

मनुष्य के पास तीन प्रकार की चेतनाएं हो सकती हैं, श्री टाइप्स आफ कांशसनेस। एक विज्ञान चेतना, एक कला चेतना और एक अध्यात्म चेतना। मनुष्य तीन चेतनाओं से जीवन के सत्य से संबंधित हो सकता है, तीन ढंग, तीन एप्रोच। एक विज्ञान की एप्रोच है, एक अध्यात्म की या धर्म की और एक कला या आर्ट की। ठीक है, इन तीनों का अंतर समझ लेना जरूरी भी है। अध्यात्म चेतस, म्प्रिचुअल कांशसनेस क्या है?

विज्ञान की चेतना अन्वेषण करती है, सत्य क्या है, इसकी खोज करती है। विज्ञान—चेतना सत्य क्या है, इसकी खोज करती है, अन्वेषण करती है, डिस्कवर करती है। जो ढंका है, उसे उघाड़ती है, निर्वस्त्र करती है, तथ्य को नग्न करती है। कला —चेतना, आर्ट कांशसनेस , जो है, उसे सजाती और संवारती है, उघाड़ती नहीं, ढांकती है—आभूषणों से, वस्त्रों से, रंगों से, कविताओं से, लयों से, छंदों से। विज्ञान उघाड़ता, नग्न तथ्य को खोजता, नैकेड दुथ, क्या है? विज्ञान तथ्य के साथ दुश्मन की भांति लड़ता है, काफ्लिक्ट, जूझता है, सत्य को जीतने की कोशिश करता है, काकरिंग। कला सत्य को ढांकती, जहां—जहां कुरूप है, असुंदर है, वहां—वहा सुंदर का निर्माण करती, तथ्यों को स्वप्न बनाती, जिंदगी के सीधे—सादे रंगों को रंगीन करती, काव्य देती, फिक्यान देती। काव्य संजोता—संवारता, तथ्य जो है, उसे उघाड़ता नहीं, ढांकता, डेकोरेट करता, डेकोरेटिव है। इसलिए विशान कई दफा ऐसे तथ्य उघाड़ लेता है, जो बड़े संघातक सिद्ध होते हैं। और कला कई बार जीवन की ऐसी अभद्रताओं को ढांक जाती है, जो अप्रीतिकर हो सकती थीं।

अध्यात्म चेतस, कृष्ण कहते हैं, अध्यात्म चेतस होकर तू समर्पण कर।

अध्यात्म—चेतना तीसरे तरह की है। न तो वह सत्य को उघाड़ती और न सत्य को ढांकती, वह सत्य के साथ स्वयं को लीन करती है। विज्ञान उघाडूता, कला ढांकती। धर्म एक हो जाता। अध्यात्म, ! सत्य क्या है, इसे नहीं जानना चाहता, सत्य कैसा होना चाहिए, इसे नहीं बनाना चाहता; अध्यात्म स्वयं ही सत्य हो जाना चाहता है। अध्यात्म की जिज्ञासा संघर्ष की नहीं, अध्यात्म की जिज्ञासा संवारने की नहीं, अध्यात्म की जिज्ञासा तल्लीनता की है, लीन हो जाने की है। सत्य जो है, उसी में डूब जाना चाहता है। वह जैसा भी हो—सुदर— असुंदर—सत्य जैसा भी है, अध्यात्म उसमें डूब जाना चाहता है। विज्ञान दुश्मन की तरह व्यवहार करता। कला मित्र की तरह व्यवहार करती। अध्यात्म भेद ही नहीं रखता मित्र और शत्रु का, अभेद व्यवहार करता है।

कृष्ण कहते हैं अर्जुन से कि तू अध्यात्म चेतसा होकर, आध्यात्मिक चेतन संपन्न होकर समर्पण को उपलब्ध हो।

ठीक ही कहते हैं। क्योंकि अध्यात्म चेतन ही समर्पण कर सकता है। विज्ञान कभी समर्पण नहीं करता। वितान समर्पण कर दे, तो बेकार हो गया। अगर एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में समर्पण कर दे, तो विज्ञान खतम। विज्ञान लड़ता है, प्रकृति को समर्पित करवाने की कोशिश करता है, खुद समर्पण कभी नहीं करता। वैज्ञानिक योद्धा की तरह जूझता है। और प्रकृति से कहता है, तू समर्पण कर, अपने रहस्यों को उघाड़, अपने वस्त्रों को अलग कर, अपने तथ्यों को प्रकट कर, मेरे सामने समर्पित हो। विज्ञान योद्धा की तरह, प्रकृति को शत्रु की भांति लेकर जीतने की कोशिश करता है।

कला लड़ती नहीं, प्रकृति को फुसलाती है, परसुएड करती है। वह कहती है, जो भी है, कोई फिक्र नहीं। लेकिन हमारा मन चाहता है, ऐसा हो। उमर खथ्याम ने गीत गाया है, कि अगर मेरा बस चले, तो सारी दुनिया को मिटाकर फिर अपने मन की दुनिया ढंग से बना लूं। कवि वही करता है। नहीं बस चलता यहां, तो कविता में बना लेता है। चित्रकार वही करता है। सुंदर नहीं मिलता ऐसा पृथ्वी पर कोई, तो एक मूर्ति बना लेता है। कला संवारती है, ढाकती है, श्रृंगार करती है—प्रेयस बन जाए जगत, जीवन प्रिय हो जाए, बस। अध्यात्म न मित्र है, न शत्रु। अध्यात्म कहता है, जो है, उसके साथ मैं एक होना चाहता हूं। कला सृजन करती, विज्ञान अन्वेषण करता, धर्म समर्पण करता। कला क्रिएटिव है, विज्ञान इनवेंटिव है, धर्म सरेंडरिंग है। इसलिए कृष्ण कहते हैं कि तू अध्यात्म चेतस हो, तो ही समर्पण को उपलब्ध हो सकता है।

इन्द्रयस्येन्द्रियस्थार्थं राग्द्धेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्‍छेत्‍तौ ह्यस्‍य परिपन्‍थिनौ ।।34।।


इसलिए मनुष्य को चाहिए को इंद्रिय इंद्रिय के अर्थ में अर्थात सभी इंद्रियों के भोगों में स्थित जो राग और द्वेष है, उन दोनों के वश में न होवे। क्योंकि वे दोनों ही कल्याण मार्ग में विध्न करने वाले महाशत्रु हैं।

जीवन के सारे अनुभव द्वंद्व के अनुभव हैं। जीवन का सारा विस्तार ही द्वंद्व और द्वैत, डुएलिटी का पोलर, ध्रुवीय विस्तार है। यहां कुछ भी नहीं है ऐसा, जिसके विपरीत न हो। यहां कुछ भी नहीं है ऐसा, जिसका प्रतिकूल न हो। यहां कुछ भी नहीं है ऐसा, जिससे उलटा न हो। जगत का सारा अस्तित्व पोलर है, ध्रुवीय है। ठीक वैसे ही जैसे एक आर्किटेक्ट, एक वस्तु शिल्पकार, एक भवन निर्माता द्वार बनाता है। तो कभी आपने देखा, द्वार पर वह कोई सहारे नहीं लेता। सिर्फ उलटी ईंटों को गोलाई में जोड़ देता है। सिर्फ ईंटों को उलटा और गोलाई में जोड़ देता है और आर्च बन जाता है। वह सारा भवन, भवन का सारा वजन उस गोलाई पर टिक जाता है। कभी आपने खयाल किया कि बात क्या है? उन उलटी ईंटों का जो तनाव है, टेंशन है; वे उलटी ईंटें एक—दूसरे को दबाती हैं, पूरे भवन के वजन को उठा लेती हैं। अगर एक—सी ईंटें लगा दी जाएं, एक कोने से दूसरे कोने तक एक ही रुख वाली ईंटें लगा दी जाएं, तो भवन तत्काल गिर जाएगा, बन ही नहीं सकता।

जीवन का सारा भवन उलटी ईंटों पर टिका हुआ है। यहां सुख की भी ईंट है और दुख की भी ईंट है। यहां राग की भी ईंट है और विराग की भी ईंट है। यहां प्रेम की भी ईंट है और घृणा की भी ईंट है। और ध्यान रहे, इस जगत में अकेली प्रेम की ईंट पर भवन निर्मित नहीं हो सकता, घृणा की ईंट भी उतनी ही जरूरी है। यहां मित्र भी उतना ही जरूरी है, शत्रु भी उतना ही जरूरी है। यहां सब उलटी चीजें जरूरी हैं। क्योंकि उलटे के तनाव पर ही जीवन खड़ा होता है।

यह बिजली जल रही है, उसमें निगेटिव और पाजिटिव के पोल जरूरी हैं। अगर वह एक ही पोल हो, तो अभी अंधकार हो जाए। ये हम इतने पुरुष—स्त्रियां यहां बैठे हुए हैं, स्त्री और पुरुष के अस्तित्व के लिए स्त्री और पुरुष का विरोध और द्वैत जरूरी है। वह जिस दिन समाप्त हो जाए, उस दिन सब समाप्त हो जाए।

जगत द्वैत निर्भर है। कृष्ण कहते हैं अर्जुन से, इंद्रियों के सब अनुभव द्वंद्वग्रस्त हैं। वहां सुख आता है, तो पीछे दुख आता है। वहां सुख आता है, तो दुख को निमंत्रण देकर ही आता है। वहां दुख आता है, तो जल्दी मत करना, धैर्य मत खोना, पीछे सुख आता ही होगा। जैसे लहर के पीछे ढलान आता है, और जैसे पहाड के पीछे खाई आती है, ऐसे ही प्रत्येक अनुभव के पीछे विपरीत अनुभव आता है। आ ही रहा है। जब लहर आ रही है सागर की, तो समझें कि पीछे लहर का गड्डा भी आ रहा है! क्योंकि बिना उस गट्टे के लहर नहीं हो सकती। और जब पहाड देखें, उतुंग शिखर आकाश को छूता, तो जान लेना कि पास ही खाई भी है, खड्ड भी पाताल को छ्ती। दोनों के बिना दोनों नहीं हो सकते। जब वृक्ष आकाश में उठता है छूने को तारों को, तो उसकी जड़ें नीचे जमीन में उतर जाती हैं पाताल को छूने को। अगर जड़ें नीचे न जाएं, तो वृक्ष ऊपर नहीं जा सकता।

सारा जीवन विरोध पर खड़ा है। इसलिए एक बहुत अदभुत घटना मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि घटती है। हम उलटा काम करते हैं। हम सदा यह कोशिश करते हैं कि दो में से एक बच जाए, जो हो नहीं सकता। हम इस कोशिश में लगते हैं कि मकान ऐसा बनाएं कि इकतरफा, एक रुख वाली ईंटों पर भवन खड़ा हो जाए। दबेंगे उसी के नीचे और मरेंगे। ऐसा भवन खड़ा नहीं हो सकता।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जो आदमी घृणा नहीं कर सकता, वह आदमी प्रेम भी नहीं कर सकता। हालांकि सब हमें समझाते हैं कि प्रेम करो, घृणा मत करो। लेकिन जो आदमी घृणा नहीं कर सकता, वह प्रेम भी नहीं कर सकता। सब हमें समझाते हैं कि किसी को शत्रु मत मानो, सबको मित्र मानो। लेकिन जो आदमी शत्रु नहीं बना सकता, वह आदमी मित्र भी नहीं बना सकता। है जीवन का ऐसा ही कठोर सत्य। जो आदमी क्रोध नहीं कर सकता, वह क्षमा भी नहीं कर सकता। हालांकि हम कहते हैं, क्षमा करो, क्रोध मत करो। लेकिन क्रोध न करोगे, तो क्षमा क्या खाक? किसको? और कैसे? और किस प्रकार?

जीवन वैपरीत्य पर निर्भर है। यह हमें खयाल में न आए, तो हम एक को बचाने की कोशिश में लग जाते हैं। अज्ञानी एक को बचाने की कोशिश करता है। ज्ञानी क्या करेगा? या तो ज्ञानी दोनों को छोड़ दे—दोनों को छोड़ दे, तो तत्सण जीवन के बाहर हो जाएगा, जीवन के भीतर नहीं रह सकता। या दोनों को एक साथ स्वीकार कर ले।

कृष्ण दूसरी सलाह दे रहे हैं। वे कह रहे हैं, तू दोनों को एक साथ स्वीकार कर ले। यहां सुख भी है, यहां दुख भी है। जन्म भी है, मृत्यु भी है। इंद्रियां अच्छा भी लाती हैं, बुरा भी लाती हैं। इंद्रियां प्रीतिकर को भी जन्माती हैं, अप्रीतिकर को भी जन्माती हैं। इंद्रियां सुख का भी आधार बनतीं और दुख का भी आधार बनतीं। ज्ञानी इन दोनों के जोड़ को, अनिवार्य जोड़ को जानकर दोनों में रहते हुए भी दोनों के बाहर हो जाता है, साक्षी हो जाता है। समझता है कि ठीक है; सुख आया तो ठीक है; दुख आया तो ठीक है। क्योंकि वह जानता है कि वे दोनों ही आ सकते हैं। इसलिए वह इस भूल में नहीं पड़ता कि एक को बचा लूं और दूसरे को छोड़ दूं। वह इस उपद्रव में नहीं पड़ता है। अज्ञानी उसी उपद्रव में पड़ता है और बेचैन हो जाता है। ज्ञानी चैन में होता है, बेचैन नहीं होता।

इसका यह मतलब नहीं कि ज्ञानी पर दुख नहीं आते। ज्ञानी पर दुख आते हैं, लेकिन ज्ञानी दुखी नहीं होता। इसका यह मतलब नहीं कि ज्ञानी पर सुख नहीं आते। ज्ञानी पर सुख आते हैं, लेकिन ज्ञानी सुखी नहीं होता। किस अर्थ में सुखी नहीं होता? इस अर्थ में सुखी नहीं होता कि जो भी आता है, वह उससे अपना तादात्म्य, अपनी आइडेंटिटी नहीं करता है। सुख आता है, तो वह कहता है, ठीक है, सुख भी आया, वह भी चला जाएगा। दुख आता है, वह कहता है, ठीक है; दुख भी आया, वह भी चला जाएगा। और मैं, जिस पर दुख और सुख आते हैं, दोनों से अलग हूं। ऐसा पृथकत्व, ऐसा भेद—अपने अलग होने के अनुभव को—वह कभी भी नहीं छोड़ता और खोता।

वह जानता है, सुबह आई, सांझ आई; प्रकाश आया, अंधेरा आया। तो न तो वह कहता है कि मैं अंधेरा हो गया और न वह कहता है कि मैं प्रकाश हो गया। न वह कहता है कि मैं दुख हो गया, न वह कहता है कि मैं सुख हो गया। वह कहता है, मुझ पर दुख आया, मुझ पर सुख आया, मुझ पर आया, मैं नहीं हो गया हूं। मैं अलग खड़ा हूं। मैं देख रहा हूं यह सुख आ रहा है। सागर के तट पर बैठे, यह आई लहर, डुबा गई और यह गई लहर। आप लहर हो जाएं, तो मुश्किल में पड़ जाएंगे। आप लहर नहीं होते। लेकिन जिंदगी के सागर में लहरें आती हैं और आप लहर ही हो जाते हैं। आप कहते हैं, मैं दुखी हो गया। इतना ही कहिए कि दुःख की लहर आ गई। भीग गए हैं बिलकुल, चारों तरफ दुख की लहर ने घेर लिया है। डूब गए हैं बिलकुल। लेकिन हैं तो अलग ही। यह रहा दुख, यह रहा मैं। सुख आए, एकदम सुखी हो जाते हैं। दीवाने हो जाते हैं। पैर जमीन पर नहीं पडते। आंखें यहां—वहां देखती नहीं, आकाश में अटक जाती हैं। हृदय ऐसे धड़कने लगता है कि पता नहीं कब बंद हो जाए। सुख हो जाते हैं।

न, सुख की लहर आई है, ठीक है, आ जाने दें, डुबाने दें, जाने दें। तब समझें कि सागर है जीवन का। आता है सुख, आता है दुख; मित्र आते हैं, शत्रु आते हैं; सम्मान—अपमान, गाली आती, प्रशंसा आती। कभी कोई फूलमालाएं डाल जाता, कभी कोई पत्थर फेंक जाता। जीवन में दोनों आते रहते हैं। ज्ञानी दोनों को देखकर अपने को तीसरा जानता है।

ऐसा अनासक्त हुआ व्यक्ति, कृष्ण कहते हैं, जीवन के समस्त बंधन से, जीवन के सारे कारागृह से मुक्त हो जाता है।

प्रवचन - २५ अहंकार का भ्रम - ओशो गीता दर्शन



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