Osho - Hindi Books Series : H

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  • Hansa To Moti Chunge

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‘लाल’ दीवानों में दीवाने हैं। उनके जीवन की यात्रा, उनके संतत्व की गंगा बड़े अनूठे ढंग से शुरू हुई। और तो कुछ दूसरा परिचय न है, न देने की कोई जरूरत है; हो तो भी देने की कोई जरूरत नहीं है। कहां पैदा हुए, किस गांव में, किस ठांव में, किस घर-द्वार में, किन माँ-बाप से - वे सब बातें गौण है और व्यर्थ है| संतत्व कैसे पैदा हुआ, बुद्धत्व कैसे पैदा हुआ? राजस्थान में जन्मे इस गरीब युवक के जीवन में अचानक दीया कैसे जला; अमावस कैसे एक दिन पूर्णिमा हो गई - बस वही परिचय है| वही असली परिचय है?----ओशो


  • Hari Bolo Hari

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हरि बोलौ हरि बोल! 
बोलने योग्य कुछ और है भी नहीं, न सुनने योग्य कुछ और है। बोलो तो हरि बोलो, चुप रहो तो हरि में ही चुप रहो। भीतर जाती श्वास हरि में डूबी हो, बाहर जाती श्वास हरि में डूबी हो। उठो तो हरि में, सोओ तो हरि में। जब हरि तुम्हें सब तरफ से घेर ले, जब हरि तुम्हारी परिक्रमा करे, जब तुम हरि के आवास हो जाओ... जागने में वही तुम्हारी दृष्टि में हो, स्वप्न में वही तुम्हारा स्वप्न भी बने, तुम्हारा रोआं-रोआं उसी में ओत-प्रोत हो जाए, तुम्हारे पास जगह भी न बचे जो उसके अतिरिक्त किसी और को समा ले--जब हरि ऐसा व्याप्त हो जाता है तभी मिलता है।
  थोड़ी भी जगह रही हरि से गैर-भरी तो तुम संसार बना लोगे। और एक छोटी सी बूंद संसार की सागर बन जाती है। एक छोटा सा बीज, वैज्ञानिक कहते हैं, सारी पृथ्वी को हरियाली से भर सकता है। एक छोटा सा बीज, जहां तुम्हारे भीतर हरि नहीं है, पर्याप्त है तुम्हें भटकाने को--जन्मों-जन्मों तक भटकाने को। ओशो 
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